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________________ षड्द्रव्य - पंचास्तिकायवर्णन निश्चयसम्यत्त्वाद्यष्टगुणाश्रयस्तथापि व्यवहारेण ज्ञानावरणाष्टकर्मास्रवः । णवट्ठ यद्यपि निर्विकल्पसमाधिस्थानां निश्चयेन सर्वजीव साधारणत्वेनाखंडेकज्ञानरूपः प्रतिभाति तथापि व्यवहारेण नानावर्णिकागतसुवर्णवन्त्रवपदार्थरूपः । दह ठाणियो भणियो यद्यपि निश्चयेन शुद्धबुद्धैकलक्षणस्तथापि व्यवहारेण पृथिव्यप्तेजोवायुप्रत्येक साधारणवनस्पतिद्वयद्वित्रिचतुः पंचेद्रियरूपदशस्थानगतः । स कः । जीवो - जीवपदार्थः एवं दशविकल्परूपो भवति । अथवा द्वितीयव्याख्यानेन पृथगिमानि दशस्थानानि उपयुक्तपदस्य पृथग्व्याख्याने कृते सति तान्यपि दशस्थानानि भवतीत्युभयमेलापकेन विंशतिभेदः स्यादिति भावार्थ: ॥ ७९ ॥७२॥ हिन्दी तात्पर्यवृत्ति गाथा ७१-७२ २०६ उत्थानिका- आगे उसी नव अधिकारोंसे वर्णित जीवास्तिकायका विशेष व्याख्यान दश भेदोंसे या बीस भेदोंसे करते हैं अन्वयसहित सामान्यार्थ - ( उवडत्तो ) उपयोगवान ( एको चेव महय्या) यह एक महान् आत्मा जातिरूपसे एक ही प्रकार है । ( सो दुवियप्पो ) वही जीव दो प्रकार है। ( तिलक्खणो होदि ) वही तीन लक्षणवाला होता है। ( चदुचंकमणो भणिदो) वही चारगतिमें घूमनेसे चार प्रकार कहा गया है। ( पंचग्गगुणप्पधाणो य) वही पांच मुख्यभावोंको धारनेसे पांचरूप है । ( छक्कापक्कामजुत्तो ) वही छ: दिशाओंमें गमन करनेवाला है इससे छः भेदरूप है । ( सत्तभङ्ग सब्भावो ) वही सात भंगोंसे सिद्ध होता है इससे सातरूप है । ( अट्ठासओ) यही आठ गुणोंका आश्रय है इससे आठरूप है । ( णवत्थो ) यही नव पदार्थोंमें व्यापक होनेसे नवरूप है । ( दस ठाणगो) यही दश स्थानोंमें प्राप्त है इससे ( जीवो ) यह जीव दशरूप ( भणिदो ) कहा गया है। विशेषार्थ- जैसे सुवर्ण अपने शुद्ध सोलहवर्णपनेके गुणकी अपेक्षा सर्व सुवर्ण में साधारण है, इससे सुवर्णराशि एक है तैसे ही सर्वजीवोंमें साधारण पाए जानेवाले केवलज्ञान आदि अनंत गुणोंके समूहकी अपेक्षा अर्थात् शुद्ध जीवजातिपनेकी अपेक्षा संग्रहनयसे एक रूप ही यह जीव द्रव्य है अथवा सर्व जीवोंमें केवलदर्शन और केवलज्ञानरूप उपयोग मौजूद है । इस साधारण लक्षणकी अपेक्षा जीवराशि एक प्रकार है। यहाँ किसीने कहा कि जैसे एक ही चन्द्रमा बहुतसे जलके भरे हुए घड़ों में भिन्न भिन्न रूप दिखलाई पड़ता है तैसे एक ही जीव मानो, जो बहुतसे शरीरमें भिन्न-भिन्न रूपसे दिखलाई पडता है। इस शंकाका समाधान करते हैं कि बहुतसे जलके घडोंमें चन्द्रमाकी किरणकी उपाधिके वशसे जलके पुद्गल ही चन्द्रमाके आकारमें परिगणत हो गए हैं, न कि आकाशमें स्थित चंद्रमा अनेकरूप
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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