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________________ - पंचास्तिकाय प्राभृत १९७ द्रव्यकर्मके उदयसे संपादित इष्टानिष्ट विषयोंके भोक्ता होनेकी अपेक्षा व्यवहारसे, उस प्रकारका [सुखदुःखरूप] फल भोगते हैं । इस प्रकार जीवके भोक्तृत्वगुणका भी व्याख्यान हुआ ॥६७।। संस्कृत तात्पर्यवृत्ति गाथा ६७ अथाकृतकर्मण: कथं फलं भुक्ते जीव इति योसौ पूर्वपक्षः कृतस्तत्र फलभोक्तृत्वविषये नयविभागेन युक्तिं दर्शयति, जीवा पोग्गलकाया-जीवकाया: पुद्गलकायाश्च । कथंभूताः । अण्णोण्णागाढगहणपडिबद्धा-अन्योन्यावगाढग्रहणप्रतिबद्धाः स्वकीयस्वकीयरागादिस्रिग्धरूक्षादिपरिणामनिमित्तेन पूर्वमेवान्योन्यावगाहेन संश्लिष्टरूपेण प्रतिबद्धाः संतः तिष्ठन्ति तावत्। काले विजुज्जमाणाउदयका स्वकीयफलं दत्वा तिनुजारा निर्जशं गतः किं कुर्वन्ति । दिति-निर्विकारचिदानंदैकस्वभावजीवस्य मिथ्यात्वरागादिभिः सहैकत्वरुचिरूपं मिथ्यात्वं तैरेव सहकत्वप्रतिपत्तिरूपं मिथ्याज्ञानं तथैवैकत्वपरिणतिरूपं मिथ्याचारित्रमिति मिथ्यात्वादिबयपरिणतजीवानां पुद्गलाः कर्तारो ददति प्रयच्छति । किं ददति ? सुहदुक्खं-अनाकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसुखाद्विपरीतं परमाकुलत्वोत्पादकमभ्यंतरे निशयेन हर्षविषादरूपं व्यवहारे पुनर्वहिर्विषये विविधेष्टानिष्टेन्द्रियविषयप्राप्तिरूपं कटुकविषरसास्वादस्वभावं सांसारिकसुखदु:खं भुजंति-वीतरागपरमाहादैकरूपसुखामृतरसास्वादभोजनरहिता जीवा निश्चयेन भावरूपं व्यवहारेण द्रव्यरूपं च भुजंते सेवंत इत्यभिप्राय: ।।६७।। एवं भोक्तृत्वव्याख्यानमुख्यत्वेन गाथा गता। हिन्दी तात्पर्यवृत्ति गाथा ६७ उत्थानिका-आगे शिष्यने जो पूर्वपक्ष किया था कि बिना किये हुए कर्मोंका फल जीव किस तरह भोगता है उसीका उत्तर नय विभागसे जीव फलको भोगता है-ऐसा युक्तिपूर्वक दिखाते हैं। अन्वयसहित सामान्यार्थ-( जीवा ) संसारी जीव और ( पुग्गलकाया) द्रव्य कर्मवर्गणाओंके पुंज ( अण्णोण्णागाढगहणपडिबद्धा) परस्पर एक दूसरेमें गाढ़ रूपसे बंध रहे हैं [काले ] उदयकालमें [विजुज्जमाणा ] पुद्गल जीवके वियोग पाते हुए [ सुहदुक्खं] साता या असाता रूप सुख दुःख [दिति ] देते हैं [ भुंजंति ] तब जीव उनको भोगते हैं । विशेषार्थ-संसारी जीवोंके अपने-अपने रागादि परिणामोंके तथा पदलोंमें स्निग्ध रुक्ष गुणके कारण द्रव्य कर्मवर्गणाएं जीवके प्रदेशोंमें जो पहलेसे ही बंधी हुई होती हैं वे ही अपनी स्थितिके पूरी होते हुए उदयमें आती हैं तब अपने-अपने फलको प्रगट कर झड़ जाती हैं-उसी समय वे कर्म अनाकुलता लक्षण जो पारमार्थिक सुख है उससे विपरीत परम आकुलताको उत्पन्न करनेवाले सुख तथा दुःखको उन जीवोंको मुख्यतासे देती हैं जो
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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