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________________ १८८ षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन जिसने अधिकरणपनेको ग्रहण किया है ऐसा स्वयमेव षट्कारकरूपसे वर्तता हुआ अन्य कारककी अपेक्षा नहीं रखता। उसी प्रकार जीव भी (१) भावपर्यायरूपसे प्रवर्तमान आत्मद्रव्यरूपसे कर्तृत्वको धारण करता हुआ, (२) भावपर्याय प्राप्त करनेकी शक्तिरूपसे करणपनेको अंगीकृत करता हुआ, (३) प्राप्य ऐसी भावपर्यायरूपसे कर्मपनेका अनुभव करता हुआ (४) पूर्व भावपर्यायका नाश होने पर भी ध्रुवत्वका अवलम्बन करनेसे जिसने अपादानपनेको प्राप्त किया है ऐसा, (६) उत्पन्न होनेवाले भावपर्यायरूप कर्म द्वारा समाश्रित होनेसे ( अर्थात् उत्पन्न होनेवाला भावपर्यायरूप कार्य अपनेको दिया जानेसे ) सम्प्रदानपनेको प्राप्त और (६) धारण की हुई भावपर्यायका आधार होनेसे जिसने किरणपोको पहला किया है ऐसा -स्वयमेव षट्कारकरूपसे वर्तता हुआ अन्य कारककी अपेक्षा नहीं रखता। ___ इसलिये निश्चयसे कर्मरूप कर्ताका जीव कर्ता नहीं है और जीवरूप कर्ताका कर्म कर्ता नहीं है ।।६२।। संस्कृत तात्पर्यवृत्ति गाथा ६२ अथ निश्चयेनाभेदषट्कारकीरूपेण कर्गपुद्गलः स्वकीयस्वरूपं करोति जीवोपि तथैवेति प्रतिपादयति । कम्मपि सयं-कर्म कर्तृ स्वयमपि स्वयमेव, कुव्वदि-करोति । किं करोति ? सम्ममप्पाणं-सम्यग्यथा भवत्यात्मानं द्रव्यकर्मस्वभावं । केन कारणभूतेन। सगेण भावेणस्वकीयस्वभावेनाभेदषट्कारकीरूपेण । जीवोवि य तारिसओ-जीवोपि च तादृशः । केन कृत्वा । कम्मसहावेण भावेण-कर्मस्वभावेनाशुद्धभावेन रागादिपरिणामेनेति । तथाहि-कर्मपुग़ल: कर्ता कर्मपुद्गलं कर्मतापन्नं कर्मपुद्गलेन करणभूतेन कर्मपुद्गलाय निमित्तं कर्मपुदलात्सकाशात्कर्मपुद्गगलेऽधिकरणभूते करोतीत्यभेदषट्कारकीरूपेण परिणममान: कारकांतरं नापेक्षते, तथा जीवोपि आत्मा कर्तात्मानं कर्मतापत्रमात्मना करणभूतेनात्मने निमित्तमात्मनः सकाशादात्मन्यधिकरणभूते करोतीत्यभेदषट्कारकीरूपेण व्यवतिष्ठमानः कारकांतरं नापेक्षते । अयमत्र भावार्थः । यथैवाशुद्धषट्कारकीरूपेण परिणममान: सन्त्रशुद्धमात्मानं करोति तथैव शुद्धात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपेणाभेदषट्कारकीस्वभावेन परिणममान: शुद्धमात्मानं करोतीति ॥६२।। एवमागमसंवादरूपेणाभेदषट्कारकीरूपेण च स्वतन्त्रगाथाद्वयं गतं । इति समुदायेन गाथाषट्केन तृतीयांतरस्थलं समाप्तं । हिन्दी तात्पर्यवृत्ति गाथा ६२ उत्थानिका-आगे कहते हैं कि निश्चयसे अभेद षट्कारक रूप होकर कर्म पुद्गल अपने भावोंको करता है और जीव अपने भावोंको करता है
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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