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________________ पंचास्तिकाय प्राभृत १७५ एवं हि पंचभिर्भावैः स्वयं परिणममानस्यास्य जीवस्य कदाचिदौदयकेनैकेन मनुष्यत्वादिलक्षणेन भावेन सतो विनाशस्तथापरेणादयिकेनैव देवत्वादिलक्षणेन भावेन असत उत्पादो भवत्येव । एतच्च 'न सतो विनाशो नासत उत्पाद' इति पूर्वोक्तसूत्रेण सह विरुद्धम् यतो जीवस्य द्रव्यार्थिकनयादेशेन न सत्प्रणाशो नासदुत्पादः, तस्यैव पर्यायार्थिकनयादेशेन सत्प्रणाशोऽसदुत्वादच बैतदनुपपत्र दिये जले करलोलानामनित्यत्वदर्शनादिति । । ५४ । । हिन्दी समय व्याख्या गाथा ५४ अन्वयार्थ – ( एवं ) इस प्रकार ( जीवस्य ) जीवको ( सतः विनाशः ) सत्का विनाश और ( असत उत्पाद: ) असत्‌का उत्पाद (भवति) होता हैं- ( इति ) ऐसा ( जिनवर : भगतम् ) जिनवरोंने कहा है, ( अन्योन्यविरुद्धम् ) जो कि अन्योन्य विरुद्ध ( १९ वी गाथाक कथन के साथ विरोधवाला ) हैं तथापि ( अविरुद्धम् ) अविरुद्ध हैं । टीका- यह, जीवको भाववशात ( औदयिक आदि भावोंके कारण ) सादि सांतपना और अनादि अनंतपना होनेमें विरोधका परिहार है ! इस प्रकार वास्तवमें पांच भावरूपसे स्वयं परिणमित होनेवाले इस जीवको कदाचित् औक ऐसे एक मनुष्यत्वादिस्वरूप भावकी अपेक्षासे सत्का विनाश और औदयिक ही ऐस दूसरे देवत्वादिस्वरूप भावकी अपेक्षा असत्का उत्पाद होता ही है। और यह ( कथन ) 'सन्का विनाश नहीं है' तथा 'असद् का उत्पाद नहीं हैं' ऐसे पूर्वोक्त सूत्रके ( १९ वी गाथांक ) साथ विरोधवाला होने पर भी ( वास्तवमें ) विरोधवाला नहीं है, क्योंकि जीवका द्रव्यार्थिकनयक कथनसे सत्का नाश नहीं है और असतुका उत्पाद नहीं हैं तथा उसीको पर्यायार्थिकनय के कथनमं सत्का नाश हैं और असत्‌का उत्पाद है और अनुपपन्न ( अयुक्त) नहीं है. क्योंकि नित्य ऐसे जलमें कल्लोलोंका अनित्यपना दिखाई देता है ।।५४।। संस्कृत तात्पर्यवृत्ति गाथा ५४ अथ यद्यपि पर्यायार्थिकनयेन विनाशोत्पादौ भवतः तथापि द्रव्यार्थिकनयेन न भवत इति पूर्वापरविरोधो नास्तीति कथयति एवं सदो विणासो एवं पूर्व गाथाकथितप्रकारेणोदयिकभावेनायुरुच्छ्रेदवशान्मनुष्यपर्यायरूपेण सतो विद्यमानस्य विनाशो भवति । असदो जीवस्स हवदि उप्पादीअसतोऽविद्यमानस्य देवादिजीवस्य पर्यायस्य गतिनामकमोंदयाद्भवत्युत्पाद: । इदि जिणारेहिं भाग - इति जिनवरैवीतरागसर्वज्ञैर्भणितं इदं तु व्याख्यातं । कथंभूतं ? आणणाविरुद्धमत्रिरुद्ध अन्योन्यतिरुद्धमायविरुद्धं । कथमिति चेत ? द्रव्यपीठिकायां सतो जीवस्य विनाशो नास्त्यमत उत्पादा नास्तीति भणितं अत्र सतो जीवस्य विनाशो भवत्यसत उत्पादो भवतीति भणितं तेन कारणेन विरोधः । तन्न । तत्र द्रव्यपीलिकायां द्रव्यार्थिकनयेनोत्पादव्ययौ निषिद्धों, अत्र तु पर्यायार्थिकनयनात्पादव्ययौ भवत इति नास्ति विरोधः । तदपि कस्मादिति चेत् ? द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकनययोः
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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