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________________ षड्द्रव्य - पंचास्तिकायवर्णन गाथा ३ चैतन्यचमत्कारमात्राच्छुद्धजीवास्तिकायाद्विलक्षणैर्मिथ्यात्वारागादिविकल्पैर्यदुपार्जितं शरीरनामकर्म तदुदयजनितविस्तारोपसंहाराधीनत्वेन सर्वोत्कृष्टावगाहपरिणतः सन् सहस्रयोजनप्रमाणं महामत्स्यशरीरं व्याप्नोति जघन्यावगाहेन परिणतः पुनरुत्सेधघनांगुलासंख्येयभागप्रमितं लब्ध्यपूर्ण सूक्ष्मनिगोदशरीरं व्याप्नोति, मध्यमावगाहेन मध्यमशरीराणि च व्याप्नोतीति भावार्थः ||३३|| हिन्दी तात्पर्य वृत्ति गाथा - ३३ १२० उत्थानिका- आगे जीव शरीर मात्र आकार रखता है इस विषयमें दृष्टांत कहेंगे, ऐसा अभिप्राय मनमें रखकर आगेका सूत्र कहते हैं । इसी तरह आगे भी कहनेवाले सूत्रका अर्थ मनमें धरके या इस सूत्रके आगे यह कहना उचित है ऐसा निश्चय करके आगे का सूत्र कहते हैं । यह पातनिकाका लक्षण यथासंभव सर्व ठिकाने जानना योग्य है । अन्वयसहित सामान्यार्थ - ( जह ) जैसे ( पउमरायरयणं ) पद्मरागमणि ( खीरे ) दूधमें (खित्तं ) डाली गई (खीरं) दूधको ( पभासयति) प्रकाश करती है ( तह) तैसे (देही) संसारी जीव ( देहत्यो ) शरीरमें रहता हुआ ( सदेहमत्तं ) अपने शरीर मात्रको ( पभासयति ) प्रकाश करता है। विशेषार्थ:- यहाँ पद्मराग शब्दसे पद्मरागरत्नको प्रभा लेना चाहिये, न कि रत्न । जैसे पद्मरागकी प्रभाका समूह दूधमें डाला हुआ उस दूध मात्रमें फैल जाता है तैसे जीव भी वर्तमान कालीन अपनी देहमें रहता हुआ उस देहको व्याप लेता है अथवा जैसे विशेष अग्नि संयोगले उफन कर बढ़ते हुये दूध में पद्मरागकी प्रभाका समूह बढ़ता है तथा दूधके घटते हुए घटता है तैसे विशेष भोजनके कारणसे देहके बढ़ने पर जीवके प्रदेश फैलते हैं तथा शरीरके घटने पर फिर सिकुड़ जाते हैं अथवा वही प्रभाका समूह दूसरे स्थान में जहाँ बहुत दूध है उसमें डाला जावे तो उस बहुत दूधमें फैल जावेगा, तथा थोड़े दूधमें डाला जावे तो उस थोड़े दूध में फैलेगा तैसे यह जीव भी तीन जगतकी तीन काल सम्बन्धी सर्व द्रव्योंकी गुण व पर्यायोंको एक समयमें प्रकाशनेको समर्थ ऐसे शुद्ध ज्ञान दर्शन स्वभावी चैतन्यके चमत्कार मात्र शुद्ध जीवास्तिकायसे विलक्षण मिथ्यात्व व रागद्वेषादि विकल्पोंमें परिणमन करके जो शरीरनामा नामकर्म बाँधता है उसके उदयसे विस्तार या संकोचपनेको करता हुआ कभी सबसे बड़ी अवगाहनाको प्राप्त होकर एक हजार योजनप्रमाण महामत्स्यके शरीरमें फैल जाता है तथा जघन्य अवगाहनामें परिणमता हुआ उत्सेध घनांगुलके असंख्यातवें भागप्रमाण लब्ध्यपर्याप्तक सूक्ष्म निगोदमें उस शरीर प्रमाण हो जाता है । मध्यम अवगाहनामें परिणमता हुआ इन दोनों जघन्य उत्कृष्ट अवगाहनाओंमें मध्यम अवगाहनावाले शरीरोंमें उनके प्रमाण फैल जाता है ।।३३।।
SR No.090326
Book TitlePanchastikay
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorShreelal Jain Vyakaranshastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages421
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size11 MB
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