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________________ 15.6.21] महाका सिंह विरह पज्जुण्णचरित्र 1313 10 पउमणह पउमालिंगिययं वंदेइ सुपासं पासहर चदप्पहदेवं विमल तणु अणह” अरुहं सकुसुम दस सीयलणाहं वर सील धरं सेयं संसेय किरण फुरियं अण्णाण तमोह-महण सुज्ज शिमलं विमलें दिय सुह हरणं पणवेइ अणंत अणंतवलं धम्म सुधम्म रह-धुर-धवलं संलि णवेइ जय संतियर कुंथु- कुंथु पमुहं सदयं वंदेइ अरंतिहुचण पियरं मल्लिं मतयाणिल गंध सम जं भुवणं णिय मुद्दे कियग्यं । सुद्धं सिद्धत्यं मुक्कहर"। जं अमि वम णिम्मविय अणु। किउ जेण चउगगई गमणसणं । पणवेइ पंचकल्लाण करें। वंदेइ जिणिंदं हय दुरियं । वास) पाभियं-वासवपुज्ज। तिजगोत्तम जं तिलोय सरणं । जे णिहयं पर समयं सवलं । मुसुमूरिय अट्टकम्भ णियल | चक्कहरं कामं तिल्थयरं । सुमणणि कलाय बहे अदयं । कमजुवलेण वियं सुर गियरं । 'उक्लितं जेण पमाय दुमं। 15 20 जिन मुद्रा से अंकित किया है। कर्म-पाश के हरने वाले शुद्ध, सिद्धार्थ (कृतकृत्य) एवं मुवित्त के गृह के समान सुपार्श्वनाथ की वन्दना करता हूँ 1 निर्मल शरीर वाले चन्द्रप्रभ देव की वन्दना करता हूँ, जिन्होंने अणु-अणु को भी अमृतोपम बना दिया। सुन्दर पुष्प के समान दाँतों वाले अनघ, अरह (निदोष) उन पुष्पदन्त की वन्दना करता हूँ, जिन्होंने चतुति-गमन का नाश किया है। पंचकल्याणक-धारी एवं उत्तमशील के धारी शीतलनाथ को प्रणाम करता हूँ। श्रेय किरणों से स्फुरायमान तथा पाप को नष्ट करने वाले श्रेयांस जिनेन्द्र की वन्दना करता हूँ। अज्ञान रूपी तम-समूह का नाश करने के लिए सूर्य के समान तथा इन्द्र द्वारा नमित वासुपूज्य को नमन करता हूँ। निर्मल इन्द्रियदु:ख के हरने वाले, तीनों लोकों में उत्तम तथा तीनों लोकों के लिए शरणभूत विमलनाथ को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने सबल रूप से परमतों का रखण्डन किया है। ऐसे अन्नन्तनाथ स्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ, जो उत्तम धर्म रूपी रथ की धुरा के बैल हैं और जिन्होंने आठ कर्मों की बेड़ी को नष्ट किया है ऐसे धर्मनाथ की वन्दना करता हूँ। जगत में शान्ति के कर्ता शान्तिनाथ को नमस्कार करता हूँ, जो चक्रधारी चक्रवर्ती हैं. कामदेव तथा तीर्थंकर हैं। जो कुन्थु प्रमुख जीवों पर दया युक्त एवं सुन्दर मन वाले होने पर भी काषायों के वध में दयारहित हैं, उन कुन्धुनाथ को प्रणाम करता हूँ। उन श्री अरहनाथ को वंदता हूँ जो त्रिभुवन के पिसा हैं तथा जिनके चरणकमलों में देव-समूह भी नमस्कार करते हैं। मलयानिल की गन्ध के समान गन्ध वाले मल्लिनाथ को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने प्रमाद रूपी वृक्ष को उखाड़ दिया है। सुब्रतों के भार को धारण करने वाले मुनिसुव्रत को प्रणाम करता 16(नगंपामसारकः। (वा करीवहिन । 15 अगाया। निगाले । (h) नियम (HUnitin |
SR No.090322
Book TitlePajjunnchariu
Original Sutra AuthorSinh Mahakavi
AuthorVidyavati Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages512
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size12 MB
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