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________________ 12.20.4]] महाकद सिश विराउ पज्जण्णधरिज [245 ___ 10 ता दिउ चनइ राम जग पिट्ठुरु तुह सपिणह के केण वि गय चिरु। जाणंतु वि गोव्वउ णिय-रिद्धिएं देक्कारहि दिउ गहिउ कुबुद्धिएँ। मुहिएण वि आरूसहि किं तुहुँ अत्थि समत्धु किंपि देखें(2) महु । सुणिवि एम सीराउहु कुद्धउ णं दिक्करिए3) णयहो4) विरुद्धउ । कबिउ चलणे धरेवि समत्थइँ जाइ पाउ सरिसउ हल स'त्थई । णिउ पुरवाहिरम्मि णिविसिद्धइँ वलिवि पलोइउ पुणु रोसद्ध' । घत्ता— अवलोइवि तणु ठाइँ णियवि चलणु णिय करयले । मुक्कु दडप्ति करेवि विभिउ अइ णियमणे हलि ।। 230।। (20) जाणेवि को वि एहु मायारउ एत्तहिं चवइ उछु-धणु धारउ । कहहि माइ भुवणयले वरंगउ कवणु एहु अइरोस-वसंगउ। संतोसेण रूव) तहो अक्खइ णिय वलेण जइर) किंपि ण लेक्खइ । पंचाणण सिंह समरु समिच्छइ अवर किंपि अणुदिणु णउ वंछइ। राम (बलदेव) से बोला-“चिरकाल से ही तेरे समान अन्य कौन-कौन इस संसार से नहीं चले गये। यह जानते हुए भी तुम अपनी ऋद्धि पर गर्व करते हो और एक द्विज को अपनी कुबुद्धि से "ललकारा" देकर सम्बोधित करते हो? तुम मुझ पर इस प्रकार रुष्ट क्यों हो रहे हो? क्या तुमने मेरी कोई सामर्थ्य देखी है? द्विज का यह कथन सुनकर हलायुध (और भी) कुद्ध हुआ मानों दिक्करी (हाथी) ही मृग के विरुद्ध हो गया हो। उसने (उस द्विज के) चरणों को पकड़कर पूर्ण शक्ति के साथ काढा–खींचा। तब उस द्विज के केवल पैर ही हलधर के हाथों से खिंचते हुए चले जाते हैं। जब वह (हलधर) नगर के बाहर जाकर घूमकर रोषपूर्वक उसकी ओर देखता है तो घत्ता- उस (द्विज) के शरीर को वहीं (रूपिणी के द्वार पर) स्थिर देखकर पुन: अपने हाथ में (उसके केवल) चरण देखकर, तब हलधर अपने मन में अत्यन्त विस्मित हुआ और धड़ाम से उन्हें वहीं पटक दिया। क्योंकि-।। 23011 (20) प्रद्युम्न पंचानन – सिंह का रूप धारणकर हलधर को पुन: विस्मित कर देता है हलधर ने जान लिया कि "यह तो कोई मायाचारी प्राणी है।" और इधर, इक्षु-धनुषधारी वह मदन बोलने लगा। उसने अपनी माता से पूछा कि हे मात:, भुवनतल में उत्तम शरीर वाला, अतिरोष वंशगत यह कौन है, जो अपने बल के कारण जगत् में किसी को कुछ भी नहीं समझता?" (पुत्र का कथन सुनकर-) रूपिणी ने सन्तोषपूर्वक उसे बलदेव का स्वरूप बताते हुए कहा—“यह हलधर पंचानन—सिंह से प्रतिदिन युद्ध की कामना किया करता है; अन्य कुछ नहीं चाहता। (19) 1. अ. है:2. ब.णि । (19) (2) दत्तं सभध। 13) त्रिषये। (4) ५ वधक: सिंह:: (20) (1) बरभद्रस्य स्वरूपं । (27 जगत्रये।
SR No.090322
Book TitlePajjunnchariu
Original Sutra AuthorSinh Mahakavi
AuthorVidyavati Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages512
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size12 MB
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