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________________ 112] महाका सिंह विरहउ पमुण्णचरित [6.21.4 सरि चक्कि णिहालइ जहिं स पिउ गउ कहिमिणि णिसागमेक्खु सवि ठिउ । चंचू"उडि भिसिण दलेण दलु 'उच्चरूल्लड सरि 'डोहड़ सलिल । दल्लह विउउ असहति) तहिं कुरलइँ बि तदुक्खु रहंगि जहिं । ता पपडिय विविह विहूइयहिं कणयप्पह राणिय दूइयहिं। सवउम्मुहं आणिय णरवरहो गणियारि वणं सिंधुर वरहो। घत्ता- महुराएँ समुहति सा वि णिहालिय तकखणेण। रणे सत्तिहि भिण्णेण णाइँ विसल्ला लक्खणेण।। 104 ।। (22) सामाहिवइमासणे णिय अद्भासणे सइँठविया दिग्गय-गय-गामिणी णिय गोसामिणि परिठविया। पुणु णिरु बावरंगउ हुवउ संचगउ ते सहु माणिउ सुरयहो सुहु हर विरहहो दुहु तेहिं लहु"। दरसिय भू भावणु' णिरु कोद्धावणु रइ-रमणु खलिक्सर जपणु अहर समप्मणु अवि समणु। बहु हाव-भाव धरु णिर विभम भरु कय करणु सक्लिासि णिलणु अणकमसिक्खणुष मणहरणु । एम सयणे रमंतहँ कील करंतह उडु णपणे कंधणपह देविहिं सहु सिग्र सेविहि गय रमणि । रात्रि में अपने प्रिय पति को बैठा हुआ देखकर भी निशा के आगमन पर (भ्रमवश) “मेरा चक्रवाक कहाँ चला गया?" यह कह कर चिल्लाती हुई चोंच उठा-उठा कर वह सरोवर के जल में विसिनी (कमलिनी) के दल से दल को मार कर उछालती रहती है और इस प्रकार वह चकवी वल्लभ के वियोग को नहीं सहती हुई दु:ख सहित जहाँ रात्रि में कुर-कुर ध्वनि करती रहती है। __इस प्रकार की रात्रि विविध-विभूतियों को प्रकट करने वाली दूतियों के द्वारा वह रानी कनकप्रभा राजा मधु के सन्मुख लाधी गमी 1 वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानों वन में गज श्रेष्ठ के सम्मुख हस्तिनी ले आमी गयी हो। घत्ता- राजा मधु ने सन्मुख लायी गयी उस कनकप्रभा को तत्क्षण ही उसी प्रकार देखा जिस प्रकार रण में शक्ति से भेदे हए लक्ष्मण ने विशाला को।। 104 11 (22) (प्रद्युम्न के पूर्व-जन्म-कथन-प्रसंग में-) राजा मधु एवं रानी कनकप्रभा की काम-केलियों का वर्णन दिग्गज-गामिनी वह श्यामा---रानी कनकप्रभा राज्य सिंहासन के, रानी के लिए प्रतिष्ठापित अर्धासन पर स्वयं आकर बैठ गयी। राजा मधु के साथ नई-नई रंगरेलियाँ हुई और वह उसके साथ शैयागत हो गयी। उसने सुरत-सुख देकर राजा मधु के विरह दुःख को शीघ्र ही दूर कर दिया। रानी ने अपनी कुद्ध भ्रकुटियों से कामवेग की भावना प्रकट कर रति-रमण भाग को दिखा-दिखाकर तथा लड़खड़ाती वाणी से प्रेमालाप स्वत: ही अधरसमर्पण, चुम्बन, आलिंगन आदि अनेक प्रकार के हाव-भाव स्वामिनी, विभ्रम-विलासों से भरी चेष्टाओं वाली उस विलासिनी ने बिना किसी द्वारा सिखाये गये मनोहर विलासों से उसे रत रखा। इस प्रकार शैया पर सखियों द्वारा सेवित मृगनयनी उस रानी कनकप्रभा के साथ रमा करते तथा काम-क्रीड़ाएँ करते हुए रात्रि व्यतीत हो गयी। 12101.अ. सो। 12102) घ चुनः दोन कूबाघल उपलयते तधा जल. गोभते । 131 सुधम्प मस्त बात। 14) क्रदर्श। (22) (1) महुना। (2) चनण. । (3) निमन. । (4) स्वप्ने पाजातः ।
SR No.090322
Book TitlePajjunnchariu
Original Sutra AuthorSinh Mahakavi
AuthorVidyavati Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages512
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size12 MB
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