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________________ A -78:१७ चमोपदेशानवम् आत्मा सविहीवच विषयासalive संपातो भवितोमदुम्सनरके तेषामकल्याणिनाम् ॥७॥ 71) मानुष्य प्राप्य पुण्यात्मशममुपगता रोगवयोगजात भरखा गत्वा धमान्तं इशि विदि चरणे ये स्थित संगमुक्ताः। का सोता वाक्पथातिकमणपद्गुणैराश्रिताना मुनीनां स्तोतय्यास्ते महर्भुिवि य ह तवप्रिय भलिभाजः ॥५॥ 72) तत्त्वार्थाप्ततपोभूता यतिवराः भवानमाहुरंश पार्न जानदनूनमप्रतिहत स्वार्थावसंदेहवत् । चारित्रं विरतिः प्रमावपिलसत्कर्माधवायोगिना एतन्मुक्तिपथलायं च परमो धर्मो भवच्छेदकः ॥ २॥ 73) इदयभुवि हगेकं बीजमुप्त स्वशङ्कामभूतिगुणसवम्भःसारणी सिकमुः। मन्दानाम् । निश्चितम् । उपदुःखनरके संपात्तः भविता सेषां नरकपतमै भविष्यति । किलक्षणे नरके। भिषमध्यान्सात्रिते अन्धकारयुक्त ॥..॥ मुनीना स्तोता कः मुनीना स्वबनकर्ता का। भपि तुन कोऽपि। किंलक्षणाना मुनीनाम्। वाक्पथातिक्रमणपटुगुणैराश्रितानां वयनातीत-त्रयनागोचरश्रेष्ठगुणयुक्तानाम्। ये मुनयः पुण्यान्मानुष्यं मनुष्यपदम् । प्राप्य । प्रशममुपगताः । भोगजाले भोगसमूहम् । रोगवन्मत्वा बनान्तं गत्वा । ये मुनयः । दृशि विवि वरणे दर्शनझामचारित्रे स्थिताः। परिनहर हिताः । जगति विषये। भषि प्रथिव्याम् । ते मुनयः। महद्धिः पपिद्धतः । खोसण्याः। किलक्षणाः पण्डिताः । तेषां मुनीना अद्रितये भक्तिभाजः । तेऽपि स्वोतव्याः ॥ ॥ इति पत्याचारधी॥ सत्त्वार्याप्ततपोमृता सिद्धान्ताईन्मुनीना श्रद्धान यतिवरा दर्श दर्शनमाहुः कथयन्ति । स्वार्थों जागत् भान आहुः खपरप्रकाशक शानम् आहुः कथयन्ति । किंलक्षणे ज्ञानम् । अप्रतिहतं न केनापि इतम् । पुनः अन्न पूर्ण ज्ञानम् । पुनः किलक्षण ज्ञानम् । असन्वेहवत् सन्देहरहितम् । योगिना मुनीनाम् । प्रमादविलसत्कर्मातवाद विरतिः चारित्रम् । प्रमादरहित बारित्रं कपयन्ति । एतत्रयं मुक्तिपथः दर्शनशानवारित्रं मुक्तिपथः कारणमिति शेषः । च पुनः । अयं परमो धर्मः । भवच्छे विनाशकः ॥ ४२ ॥ एकम् । एक् दर्शनं बीजम् । हृदयभुवि हृदयभूमौ । उतं वापितम् । किलक्षण दर्शनम् । स्वशाराप्रमृतिगुणरहता है । किन्तु वैसा करनेसे वे अज्ञानी जन ही अपनी आत्माका घात करते हैं, क्योंकि, कल्याणमार्गसे भ्रष्ट हुए उन अज्ञानियोंका गाढ़ अन्धकारसे व्याप्त एवं तीन दुःखोसे संयुक्त ऐसे नरक, नियमसे पतन होगा ॥ ७० ॥ जो मुनि पुण्यके प्रभावसे मनुष्य भवको पाकर शान्तिको प्राप्त होते हुए इन्द्रियजनित भोगसमूहको रोगके समान कष्टदायक समझ लेते हैं और इसीलिये जो गृहसे वनके मध्यमें जाकर समस्त परिग्रहसे रहित होते हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यकचारित्रमें स्थित हो जाते हैं; वचनके अगोचर ऐसे उत्तमोत्तम गुणोंके आश्रयभूत उन मुनियोंकी स्तुति करनेमें कौन-सा स्त्रोता समर्थ है। कोई मी नहीं। जो जन उक्त मुनियोंके दोनों चरणों में अनुराग करते हैं वे यहां पृथिवीपर महापुरुषों के द्वारा स्तुति करनेके योग्य हैं ॥ ७१ ॥ इस प्रकार मुनिके आचारधर्मका निरूपण हुआ ॥ सात सत्त्व, देव और गुरुका श्रद्धान करना; इसे मुनियोंमें श्रेष्ठ गणघर आदि सम्यग्दर्शन कहते हैं । स्व और पर पदार्थ दोनोंकी न्यूनता, बाधा एवं सन्देहसे रहित होकर जो जानना है इसे ज्ञान कहा जाता है । योगियोंका प्रमादसे होनेवाले कर्मास्रवसे रहित हो जानेका नाम चारित्र है । ये तीनों मोक्षके मार्ग हैं । इन्हीं तीनोंकोही उत्तम धर्म कहा जाता है जो संसारका विनाशक होता है ॥७२॥ हृदयरूपी पृथिवीमें बोया गया एक सम्यग्दर्शनरूपी बीज निःशंकित आदि आठ अंगस्वरूप उत्तम जल्से परिपूर्ण शुद्र एक जालम् । २ व सारिणी। पति बलाचारभः पूर्णः, म इति यत्माचार सति बलाचारभमः ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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