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________________ ५४ पानम्बि-पविशतिः रुपण गृहस्से वो कौमा ही परण है संयोग-वियोग बनम्म-मरमादि पिनामाषी है ५५ कृपणके धनकी स्थिरतापर प्रग्यकारकी कल्पमा ७ देवकी प्रबलताको देखकर धर्म रत होना उत्तम पान्न माविका स्वरूप व उनके लिये दिये ५१-५५ गये दानका फल १४-५९/नित्यपबाशत् अपत होने दानके बार मेद जिनालयके लिये किया गया भूमिदान संस्कृतिकी ४. एकत्यससति १-८०, पृ. १११ स्थिरता का कारण है , परमारमा विदात्मक ज्योतिको समस्कार कुपनको दामका उपदेश नहीं रखता, यह तो - माससमयके लिये ही प्रीतिकर होता है ५२-५३ पितच प्रत्येक प्राणीमें है, पर मशाली उसे प्रकरणके अन्तमें गुरु वीरनन्दीके वरकारका स्मरण ५५ । जानते नहीं | मनेक शाबाश मी उसे काहमें स्थित मनिके ३. अनित्यपश्चाशत् १-५५, पृ. ९३| समान नहीं जानते हैं प्रकरणके प्रारम्भमें बिनका सरण कितने ही समझाये आमेपर मी उसे सीकर मही करते शरीरका स्वरूप व उसकी मस्थिरता शरीराविक स्वमावत: मस्थिर होनेपर उनके लिये। कितने ही मनेकान्तात्मक वस्तुस्वरूपको शोक व हर्षका मानना योग्य नहीं एकातरूपसे ग्रहणकर जामन पुरुषोंके __ समान न होते है पम सर्वत्र विद्यमान है | कितने ही थोड़ा-सा बानकर भी इसे गर्दके वश उदयप्राप्त कर्मका फल सभीको भोगना पड़ता है ३२ ग्रहण नहीं करते दैवकी प्रबलताका उदाहरण लोगोंने धर्मके स्वरूपको विकृत कर दिया है ९ मृत्युफे मास बनते हुए भी मज्ञानी जन स्थिरता कौन-सा धर्म यथार्थ है का अनुभव करते है २५-१ चैतन्यका ज्ञान और उसका संयोग पुलम है संसारकी परिवर्तनशीलताको देखकर गर्षके भम्प जीव पांच कम्धियों को पाकर मोक्षमार्गमें लिये अवसर नहीं रहता स्थित होता है मनुष्य सम्पत्ति के लिये कैसा भमर्थ भरवा है । मुक्तिके कारणभूत सम्पग्दर्शनादिका सरूप -" शोकसे होनेवाली हानिका दिग्दर्शन मुद निश्चयमयकी मपेक्षा के सम्बग्दर्शनादि मिर भापतिमाप संसारमें विवाद फरना उचित नहीं है। होकर मसग भारमखरूप है जीवित माविको नश्वर देखकर भी थारमाहित प्रमाण, नप और निक्षेप अर्वाचीन पदमें नहीं करमा पागलपमका सूचक है उपयोगी है मास्युके मागे कोई भी प्रयत्न नहीं चलता ५८ निमय मौर व्यवहार पटिमें माल्मावलोकन मनुष्य ची-पुत्रावि में 'मे-मे' करता हुमा ही जो एक मखर मामाको जानता है वही काका प्रास बन जाता है मुक्तिको प्राप्त होता है १८-१९ दिनोंको मत्युके द्वारा विभक भाषुके खण्ड केवलज्ञाम-दर्शनसरूप मात्मा ही जानने देखने ही समझना चाहिये योग्य है गारोफी तो बात क्या, इन्द्र और चाय मी योगी गुरुपदेशले भारमको जानकर कृतकृत्य हो मृत्यु के पास बनते हैं ४२-१३ . .
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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