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________________ मोर विषय-सूची रोक जो प्रेमसे उस परमज्योतिकी बात मी सुनवा ५. गतिभावनाष्टल -९, स. १२५ है उसे मुक्तिका भाजण माम समासमा मोहर्मजमित विकल्पोंसे रहित मुनि जयवंत हो । मुनि क्या विचार करते हैं जो कर्मले पृषक पकनामाको जानता है वह कृती कौन कहा जाता है उसके सस्पको पा लेता है विशेषके अनुसार कष्ट सहनेवाले शास्त परका सम्बाब पन्धका कारण है । मुनियों के मार्गसे आनेकी भमिलाषा । कर्मके मभावमें भामा ऐसा गाम्न हो जाता है उत्कृष्ट समाधिका वस्प व उसके धारक जैसा वायु सभाबमें समुद्र २६ तस्वरवके शाता ये मुनि हमारे लिये शान्तिके बाम-पाका विचार २४-10. निमित्त हो। वही नामज्योति ज्ञान-दर्शमाविकप सबकुछ है १९-५२ | यतिभाषनाहरके पढ़ने का फक मोक्षकी मी इच्न मोमपाक्षिमें बाधक है . मम्बबीवको तम्यस्थम मामात्र विचार ६. उपासकसंस्कार १-६२, पृ. १२८ कर समपरम्पराको गहना चाहिये ५४.५० मनेक रूपोंको मात उस परमज्योतिका वर्णन | धर्मस्थिति के कारणभूत मावि चिनेन्न श्रेषोस राजाका सारण करना सम्भव नहीं है ५८-41 भर्मा स्वरूप जो बीच इस मारमतलका विचार ही करता है दीर्घतर संसार किनका है वह देवों के द्वारा पूजा जाता है धर्मके दो भेद और उनके सामी सच देखने यस परमज्योतिकी प्राक्षिका उपाय गृहस्थ धर्मके हेतु म्यों माने जाते हैं साम्मभावको बताया है। कलिकाममें बिनालय, मुनियोंकी स्थिति और साम्पके समानार्थक मामय उसका स्वरूप दानधर्मके मूल कारण प्रावक है । समता सरोवर के माराधक मामा-सके लिये .. गृहस्पोंके षट् कर्म नमस्कार सामाणिकपणा वरूप शानी बीवको तापकारी मृत्यु भी भगत (मोस) सामायिके लिये सास म्पसनोका स्वाग मावश्यक ९-.. संगके लिये होती है म्यसनीके धर्मान्वेषणकी योग्यता नहीं होती " विवेकके बिना मनुष्य पर्याय पतिकी बर्थता र सात मरकोंने अपनी सदिके लिये मानो पिका स्वरूप एक एक व्वसमको नियुक किया है । विकी बीजके लिये संसारमें सब ही दुमका | पापमय राजाने धर्म-शबुके विनाशाय अपने प्रतिमासित होता है राज्यको सात व्यसनोंसे सांगतरूप विचको यो लिये देव त्या और सपादेवलाई में किस खास भकिसे जिनपरोनादि करनेवाले समं पदनीष पायसहसके लिये गंगा मदीकी उपमा से बाते पर पावनति संसार-समुदसे पार होमेमें जिवदर्शनादि सामनेवालों का जीन्स म्य। १५ प्रकके समान है उपासकोंको मातकाक और वसा मोम और बाहर निकति मावि स्व मामासे क्या करना चाहिये मिण प्रतिभासित होते है हाम-कोचमकी प्राक्षिक कारणभूव गुरुपोंकी पकत्वममति के सम्मान माविका फल पालमा १२
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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