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________________ ५ . ओक । होक फरले मिच बारमवत्वका विचार व उसका पर 1५४-1] दानके बिना विभूतिकी नियन्यादाहरण १५ गुमाउपदेश विम्म बस्य समान है पर बागपशीकरममंत्र के समान है पोनि-पपिकोका समय समको नमस्कार ! वानजनित पुण्यकी राजलक्मीसे हुकमा २. उस धर्मका वर्णन केवली ही कर सकते हैं । दानके बिना मनुष्यभवकी विफलता २१-२२ पह धर्मसायन मिथ्यात्वादि कामकारबोंका हानसे रहित भूतिकी अपेक्षा वो निधनसा ही परिवाग करनेपर ही प्रास हो सच्ची १६५ · मनुष्य पर्याय व उत्तम ऊस भावि दुर्लभ है, फिर दानके बिमा गृहत्यामकी म्यर्थता २५-१५ सानो पाक कमानी -13 पासवान परफोकपात्रा नाश्ता के समान है २॥ शारीरको स्वास्प व मायुको वीर्ष समझकर भविष्य में बानमा संकल्प मात्र मी पुग्मवर्षक है २७ चर्मक माचरणका विचार करना नितान्त पात्रके मानेपर दामाविले उसका सम्मान करना जाता है अभिश्ता है पदस्माके साथ प्रायः तृष्णा मी पम्ती ही है 01-२ वानसे रहित दिन पुनके मरणदिनसे भी धरा है १९ परिवीनशील संसार में जीवित और धन धर्म लमित्त होनेवाले सब विकल्प दागले ही माविको नवरता सा होवे हैं मृत्यु मानिचार्य होनेपर निकी जम सके वान बिना भी मपनेको पानी प्रगट करनेवाला सिने शोर नहीं करते है महान् दुमका पात्र होता है धर्मका एक भनी सम्पसिके अनुसार गृहस्थको पोकाम धर्मकी रक्षाले शी भामरक्षा सम्भव १८२-३ बोका पान देना ही चाहिये २२ धर्मकी महिमा १८५-१६ दानकी अनुमोदनासे मिष्याची पा भी शतम प्रकरण मन्समें प्रम्बकारकी गुपसे परपावना १९७ भोगभूमिको प्राप्त करता है ५ भोपदेशामुतके पास के लिये प्रेरणा वानसे रहित मनुष्यकी अविवेकताके बाहरण ३४-१५ जो न दानके उपयोगमें भाता है वही बन रस्ता २. दानोपदेशन १-५४, पृ. ७८ धनका क्षय पुण्यके क्षमसे होता है, न कि वानसे ३४ मक्तीर्षके प्रवर्तक मार जितेन्द्र और दाम लोभ सही उत्तम गुणोंका पासक है ९ तोके प्रवर्तक श्रेयांस राबाका सरण ।। दानले जिस्की कीर्तिका प्रसार नहीं हुमा र प्रेमांस राधाकी प्रसप्ता जीवित रहकर भी सुतके समान है । कोमी जीवों के उदारार्थ दानोपदेशकी प्रतिज्ञा . मनुष्यभवकी सफलता दान है, मन्मथा ग्दरको सत्पात्रदान मोहको ना करके मनुष्यको सहरून पूर्ण वो कुत्ता भी करता है ॥ बनाता है दानको छोड़कर मम्म प्रकारसे किया जानेवाला धनकी सफलता दानमें है बनका उपयोग कारकी २ सपासवानसे दम्प बडबीजके समान पढ़ता ही है। प्राणीके साथ परोको धर्म हो जाता है किन भक्तिसे दिया गया दान दाता और पान दोनोंके सब अमीट सामग्री पानवानसे ही प्रास होती है । लिये हितकर होता है जो व्यक्ति धनके संस्य व पुत्रविमाहाविको दानकी महिमा पक्ष्यमें रखकर भविष्य में बानकी मापना सत्पात्रवान के बिना गृहस्थ जीवन निष्फल है . । रखता है इसके समान मू दूसरा नहीं है १५
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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