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________________ -8191१६-१३] १६. स्वयंभूस्तुतिः २३९ 815) यदीयपादद्वितयप्रणामतः पतस्यधो मोहनधूलिरङ्गिनाम् । शिरोगता मोहटकप्रयोगतः स पुष्पदन्तः सततं प्रणम्यते ॥९॥ 816 ) सतां यदीय वचन सुशीतलं यदेव चन्द्रादपि चन्दनादपि। तवत्र लोके भवतापहारि यत् प्रणम्यते किं न स शीतलो जिनः ॥ १० ॥ 817) जगाये श्रेय तो पयादिति प्रसिद्धनामा जिन एष बन्यते।। ___ यतो जनानां पहुभक्तिशालिनां भवन्ति सधैं सफला मनोरथाः ॥११॥ 818) पवाजयुग्मे तष वासुपूज्य राजनस्यं पुण्यं प्रणतस्प तद्भवेत् । यतो न सा श्रीरिद हि त्रिविष्टपे न तत्सुखं पम पुरः प्रधावति ॥ १२ ॥ 819 ) मलैर्विमुक्तो विमलो न कैर्जिनो यथार्थनामा मुक्ने नमस्कृतः । सदस्य नामस्मृतिरप्यसंशयं करोति वैमस्यमधारमनामपि ॥१३॥ भगतः संयुतः न । च पुनः । यः तीर्थकरः दोषाकरताम् अपि । न यमौ न यातवान् ॥ ८॥ स पुष्पदन्तः जिनः सतत प्रणम्यते । यवीयपादाद्वितयप्रणामतः यस्य पुष्पदन्तस्य पादयस्य प्रणामतः। अमिनो प्राणिनामू। मोहनधूलिः अधः पतति । फिलक्षणा मोहनधूलिः । मोबठकप्रयोगतः शिरोगला ||९| सीतलः जिनः किन प्रणम्यते। अपि तु प्रणभ्यते । यधीय पवमम् । सतां साधूनाम् । चन्दादपि चन्दनायपि मुशीतलम् । यदेव वयः । अत्र लोके । भवतापहारि संसारतापनाशनम् ॥10॥ एषः यः इति प्रसिद्धनामा जिनः वन्द्यते। हि यतः । जगत्रये । इतः श्रेयसः सकाशात् । जनः । श्रेयः सुखम् । भयात् । यतः श्रेयसः । जनानी लोकानाम् । सर्वे मनोरथाः सफला भवन्ति । किंलक्षगानां जनानाम् । बहुभक्तिशालिना बहुभाषियुकानाम् ॥ ११॥ मो वासुपूश्य । तव पदाम्जयुम्मे प्रणतस्य जनस्य । तत्तत्पुण्यं भवेत् । यतः पुण्यात् । इद हि। त्रिविक्षपे लोके । सा श्रीः न सत्सुखं न या श्रीः यत्सुखं पुरः अप्रे न प्रधावति न आगस्छति ॥ १२ ॥ विमल: जिनः । मुक्ने त्रिलोके । के भव्यैः । न नमस्कृतः । अपि तु सर्वेः नमस्कृतः । किलक्षणः विमलः । मलैविमुकः यथार्थनामा । तत्त. सन्तापको नष्ट करनेवाले चन्द्रप्रभ मुनीन्द्र जयवन्त होवें ॥ ८ ॥ जिसके दोनों चरणोंमें नमस्कार करते समय मोहरूप ठगके प्रयत्नसे प्राणियोंके शिरमें स्थित हुई मोहनधूलि (मोइनजनक पापरज) नीचे गिर जाती है उसे पुष्पवन्त भगवान्को मैं निरन्तर प्रणाम करता हूं ॥ विशेषार्थ-प्राणियोंके मस्तक ( मस्तिष्क ) में जो अज्ञानताके कारण अनेक प्रकारके दुर्विचार उत्पन्न होते हैं वे जिनेन्द्र भगवान्के नामस्मरण, चिन्तन एवं बन्दनसे नष्ट हो जाते हैं। यहां उपर्युक्त दुर्विचारोंमें मोहके द्वारा स्थापित धूलिका आरोप करके यह उत्प्रेक्षा की गई है कि मोहके द्वारा जो प्राणियोंके मस्तकपर मोहनधूलि स्थापित की जाती है वह मानो पुष्पदन्त जिनेन्द्रको प्रणाम करनेसे ( मस्तक झुकानेसे ) अनायास ही नष्ट हो जाती है ॥९॥ लोकौ जिसके वचन सजन पुरुषों के लिये चन्द्रमा और चन्दनसे भी अधिक शीतल तथा संसारके तापको नष्ट करनेवाले हैं उस शीतल जिनको क्या प्रणाम नहीं करना चाहिये ! अर्थात् अवश्य ही बह प्रणाम करनेके योम्म है ॥१०॥ तीनों लोकोंमें प्राप्पिसमूह चूंकि इस श्रेयांस जिनसे श्रेय अर्थात् कल्याणको प्राप्त हुआ है इसलिये जो 'श्रेयान्' इस सार्थक नामसे प्रसिद्ध है तथा जिसके निमिससे बहुत भक्ति करनेवाले जनोंके सब मनोरथ (अभिलाषा) | सफल होते हैं उस श्रेयान् जिनेन्द्रको प्रणाम करता हूं ॥ ११ ॥ हे वासुपूज्य ! तेरे चरणयुगलमें प्रणाम करते हुए प्राणीके वह पुण्य उत्पन्न होता है जिससे.तीनों लोकोंमें यहां वह कोई लक्ष्मी नहीं तथा वह कोई सुख भी नहीं है जो कि उसके आगे न दौड़ता हो ॥ विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि वासुपूज्य जिनेन्द्रके चरण-कमलमें नमस्कार करनेसे जो पुण्यबन्ध होता है उससे सब प्रकारकी लक्ष्मी और उत्तम सुख प्राप्त होता है॥ १२॥ जो विमल जिनेन्द्र कर्म-मलसे रहित होकर 'विमल' इस सार्थक नामको धारण करते हैं उनको खेको मन्त्र किन भव्य जीवोंने नमस्कार नहीं किया है ! अर्थात् सभी भव्य जीवोंने उन्हें नमस्कार किया ग। २ पाबाचा पम्पयनस ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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