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________________ २२८ पचनन्दि-पञ्चविंशतिः [811 : १६५811) नयप्रमाणादिविधानसबर्ट प्रकाशित तस्वमतीय निर्मलम्। यतस्त्वया तत्सुमते ऽत्र तापकं तदन्वयं नाम नमोऽस्तु ते जिन ॥ ५ ॥ 812 ) रराज पचप्रमतीर्थकत्सदस्यशेषलोकत्रयलोकमभ्यगः । नभस्युनातयुतः शशी यथा पचो ऽमृतवर्षति यः स पातु नः ॥६॥ 813) नरामराहीश्वरपीसने अयी घृतायुधो धीरमना पध्ध विनापि सखीनंनु येन निर्जितो जिनं सुपार्श्व प्रणमामि तं सदा ॥७॥ 814) शशिममों वागवृतांशुभिः शशी परं कदाचिन कलङ्कसंगतः। म चापि दोपाकरतां ययौ यतिञ्जयत्यसो संसतितापनाशनः ॥ ८॥ रहितः । यतः कारणात् । विश्व समस्खम् । ला सोकम् ॥ ४॥ मो सुमवे भो जिन । नया यतः अवीव निर्मलं तस्वं प्रकाशितम् । किंलक्षणं संतम् । नयप्रमाणादिविधानसद मय-प्रमाणावियुका। तत्तस्मात्कारणा। बत्र जगति । ताबई नाम । तदन्वयं नपा प्रता] मातम् । ते तुभ्यं नमोऽस्तु ॥ ५॥ पापमतीर्थक्त् जिनः । सपति समवसरणसभामाम् । मशेषरोकायलोकमध्ययः भध्यक्ती । रराज शरमे। सपा नभसि साकाशे। समातयतः तारागणयुक्तः। शकी चन्द्रः । ररावा यः पाप्रमापाचोऽमृते। पति सपनप्रभा नामस्मान पातु रक्षतु तं सुपार्थ जिन सदा प्रणमामि । ननु इति वितः। येन सुपारेन । शर्विनापि । सषष्पजे कामः । निर्जितः । विलक्षणः कामः । नर-अमर-बहीवरनन्द्रधरणेन्द्रचक्रिणां पीबने । जयी जेता ! पुनः विलक्षणः कामः । प्रतायुधः धीरमनाः ॥७॥ मसौ शशिप्रभः पतिः जयति । विलक्षगः श्रीचनप्रमः । संशतितापनाशनः । यः चन्द्रप्रभः माक्-वचन-अमृत-अंशुभिः किरमः । पर श्रेष्ठम् । शशी यः चन्द्रः कदाचित कला अभिनंदन जिनके लिये मैं मुक्तिके प्राप्त्यर्थ नमस्कार करता हूं ॥ ४ ॥ हे समुति जिनेन्द्र ! चूंकि आपने नय एवं प्रमाण आदिकी विधिसे संगत तत्त्व ( बस्तु स्वरूप) को अतिशय निषि रीतिस प्रकाशित किया था, अत एव आपका सुमति (सू शोभना मतिर्यस्यासौ सुभतिः उत्तम बुद्धिवाला) यह नाम सार्थक है। हे जिन ! आपको नमस्कार हो ॥ ५॥ जिस प्रकार आकाशमें तारासमूहले संयुक्त होकर चन्द्र शोभायमान होता है उसी प्रकार जो पद्मप्रभ तीर्थकर समवसरणसमामें तीनों लोकोंके समस्त प्राणियों के मध्यमें स्थित होकर शोभायमान हुआ तथा जिसने वहां वचनरूप अमृतकी वर्षा की थी वह पमपम जिनेन्द्र हमारी रक्षा करे ॥ ६ ॥ जो साहसी मीनकेतु (कामदेव ) शखको धारण करके चक्रवर्ती, इन्द्र और धरणेन्द्रको भी पीड़ित करके उनके ऊपर विजय प्राप्त करता है ऐसे उस कामदेव सुभटको भी जिसने विना शस्त्रके ही जीत लिया है उस सुपा जिनके लिये मैं सदा प्रणाम करता हूं ॥ विशेषार्थ---संसारमें कामदेव (विषयवासना) अत्यन्त प्रवल माना जाता है। दूसरोंकी तो बात ही क्या है, किन्तु इन्द्र, धरणेन्द्र और चक्रवर्ती आदि भी उसके वशमें देखे जाते हैं। ऐसे सुभट उस कामदेवके ऊपर वे ही विजय प्राप्त कर सकते हैं जिनके हृदयमें आत्म-परविवेक जागृत है । भगवान् सुपाचे ऐसे ही विवेकी महापुरुष थे | अत एव उन्हें उक्त कामदेवपर विजय प्राप्त करनेके लिये किसी शस्त्रादिकी भी आवश्यकता नहीं हुई। उन्होंने एक मात्र विवेकबुझिसे उसे पराजित कर दिया था । अत एव वे नमस्कार करनेके योग्य हैं ॥ ७॥ चन्द्रमाके समान प्रभावाले चन्द्रमा जिनेन्द्र यद्यपि बचनरूप अमृतकी किरणोंसे चन्द्रमा थे, परन्तु जैसे चन्द्रमा कलंक (काला चिह) से सहित है वैसे वे कलंक ( पाप-मल) से सहित कभी नहीं थे। तथा जैसे चन्द्रमा दोषाकर (रात्रिको करनेवाला) है वैसे वे दोषाकर ( दोषोंकी खानि ) नहीं ये अर्थात् वे अज्ञानादि सग दोषोंसे रहित थे। वे संसारके कम र प्रतिमोऽनम्। का प्रमुगाम। स पाप ४ मयः। ५ पाप। (स'मसूरी कसि।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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