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________________ -668 : १२.१] १०. माचर्यरझापतिः तस्मात्संसूतिपातमीतमतिभिः प्राप्तस्तपोभूमिका कर्तव्यो प्रसिभिः समस्तयुषतित्यागे प्रयत्नो महान् ॥ ६ ॥ 666) मुक्तारि डढार्गला भवतरोः सेके उना सारिणी । मोहल्यायिनिर्मिता नरमृगस्याषन्धने वागुरा। यस्संगेन सतामपि प्रसरति प्राणातिपातादि तत् तद्वार्तापि यतेरबदल कुर्माण के मा गुना 667) तावत्पूज्यपदस्थितिः परिलसत्तावधशो वृम्भते तावच्चतरा गुणाः शुचिमनस्तावत्तपो मिर्मलम् । तापसमकथापि राजति यतेस्तावत्स दृश्यो मवेद यावत्र सरकारि हारि युवते रागान्मुखं वीक्षते ॥८॥ 668 ) तेजोहानिमपूसतो वतहतिं पापं प्रपातं पथो मुक्ते रागितयागनास्मृतिरपि क्लेशं करोति भुवम् । युवतिस्यागे महान् प्रथमः कर्तव्यः । मिलक्षणेः प्रतिमिः । संसतिपावेन भीतमतिभिः । पुनः किसक्षणैः प्रतिभिः । तपोभूमिका प्रामः॥६॥भाना श्री। मुदति रागेला । अञ्जना भवतरोः संसारपक्षस्या सेके सिडने सारिणी अलधोरणी। आरना। मरमृगस्य भावन्धने। मोहध्यापन मिलन विनिर्मिता कागुरो। यस्संगेन यस्याः श्रियाः संगेन । सतामपि । तत् प्राणातिपातादि प्रसरति प्राणनाशोबूर्व पापं प्रसरति । तद्वार्तापि । यतेः मुनेः । यतिस्वहतये भवेत् । पुनः सा श्री प्रत्यक्ष यतित्यपवनाशे किन कुर्यात् । अपि तु कर्यात् ॥॥ यावत् कालम् । रागात् युक्तेः मुर्ख न वीक्षते । किलक्षणं मुस्वम् । सरकारि कामोत्पादकम् । पुनः हालि मनोहरम् । तापकालम् । पूज्यपदस्थितिः । परिलसत् वीतियुक्त यशः तावत् कृम्भते । शुभ्रतराः गुणाः तापत् सन्ति। तापत् मनः शुचिः । तावत् तपो निर्मलम् । तावत्काल मतेः धर्मकथापि । रामते शोभते । स यतिः । तावत्कालम् । दृश्यः नष्ट योग्यः भवेत् । यावत्कालं युवतेः मुखम् । न वीक्षते न अवलोकयति ॥ 4 ॥रागिलया अङ्गनास्मृतिः श्रीस्मरणम् । अपि नुवं निक्षितम् । वेोहानि करोति अपवित्रता करोति । बतइति करोति व्रतविनाशं करोति । पापं करोति । स्त्रीस्मरण मुक्तो पया प्राप्त हुई है तथा जो तपका अनुष्ठान करनेवाले हैं उन संयमी बनोंको समस्त खीजनके त्यागमें महान् प्रयत्न करना चाहिये ॥ ६ ॥ जो श्री मोक्षरूप महलके द्वारकी दृढ़ अर्गला ( दोनों कपाटोंको रोकनेवाला काठविशेष-बेटा) के समान है, जो संसाररूप वृक्षके सींचनेके लिये सारिणी ( छोटी नदी या सिंचनपात्र) के सहश है, जो पुरुषरूप हिरणके बांधनेके लिये वागुरा (जाल) के समान है, तथा जिसकी संगतिसे सजनोंके मी प्राणघातादि ( हिंसादि) दोष विस्तारको प्राप्त होते हैं; उस चीका नाम लेना भी जब मुनिबतके नाशका कारण होता है तब मला वह स्वयं क्या नहीं कर सकती है ! अर्थात् वह सभी व्रत-नियमादिको नष्ट करनेवाली है।॥ ७ ॥ जब तक कामको उद्दीपित करनेवाला युवती श्रीका मनोहर मुख अनुरागपूर्ण दृष्टिसे नहीं देखता है तब तक ही मुनिकी पूज्य पदमें स्थिति रह सकती है, तब तक ही उसकी मनोहर कीर्तिका विस्तार होता है, तब तक ही उसके निर्मल गुण विद्यमान रहते हैं, तब तक ही उसका मन पवित्र रहता है, तब तक ही निर्मल तप रहता है, तब तक ही धर्मकी कथा सुशोमित होती है, और तब तक ही वह दर्शनके योग्य होता है ॥ ८॥ रामबुद्धिसे किया गया सीका स्मरण भी जब निश्चयसे मुनिके तेजकी हानि, अपवित्रता, व्रतका विनाश, पाप, मोक्षमार्गसे पतन तथा देशको करता है तब भला उसकी समीपता, दर्शन, वार्तालाप और स्पर्श आदि क्या अनोंकी. परम्पराको नहीं करते है ! अर्थात् पशकुछ साल पुनः। गाएरा विनिमिता।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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