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________________ परन्दि-पर्षिशतिः [604:११५ 604) मई की रशियोनिधिमगोवनें सहाय । मनुभूतियाब नलस्यात्मनि परं गहनम् ॥७॥ 60) महविरसोपवबोधवाय कर्मशवाय शुखमयः। सा मुमुक्षुयमिति वरपे सदाश्रित किचित् ॥८॥ 606) मायेऽस्तायौ भूताओं देशिवस्तु शुखमयः । शुबनयमाभिता से प्राघुवन्ति यवयः पदं परमम् ॥९॥ 607) तवं वागविवति मतिमासाच जायते वाच्यम् । गुरुपर्वयादिविवृते प्रसरति तचापि शतशाखम् ॥ १० ॥ 608) मुग्योपचारविति व्यवहारोपायतो यवः सम्तः । पात्या भयम्ति शुवं तत्त्वमिति म्यवाहतिः पूज्या ॥११॥ 600) वात्मवि निमोतियो खवये मवक्षतये । ... मुसार्वपातिदेयमेव ववितवम् ॥१२॥ पुगतम् खम्नम् बक्षिा । सन्मने साराय । तु पुनः । मुल्ये मोक्षाय । या युद्धात्मज्योतिरुपलभिः सा उसका मुख्यान ज्योति लम् । का बामनि । पोषोऽपि विरल: अप्राप्यः । अत्र मात्मनि रतिः मिवरणम् । माथ् मसिनापानांवाचीनाम् । बोचरः। तत्र वात्मनि । बनुभवि दुर्लक्ष्या ॥ ॥ व्यवतिः म्यवहारः। भोपदेशनाव मुक्सोक्साब माति । पुनका शव भवति । बई मुमुक्षुः। इति हेतोः । किंचित् सदामित समावितम् । खार्थम् बाल्माम् ।चित बावेमविवामि ॥ ८॥ म्यवहारः भूताः भूतानां प्राणिनाम् मयः भूतार्थः (१) मार गिराः सवितः या भूतान सखायः देशितः कषितः । वे मतमः मुनयः शुखमयम् भाश्रिताः ते मुनयः। पर पर प्रारदि स लंबा-अनिवति वरनरदितम् । तस्वम् । व्यवहार्ति म्यबहारम् । भासाद्य प्राप्य । बाचं कस्बेकम् । बच्चे ब लम् । गुणवादिविषः महारात् शतशास प्रसरति ॥ १०॥ यतः यस्मादेतो। सन्सासमार-उपासवा, मुश्म-उपवारविकृति शुनिवयम्सहर हावा । शुद्ध तत्वम् माधयन्ति । इति हेतोः1 भएकी रामदारक एम . वात्मनि विषये । निववोपस्थितयः दर्शनज्ञानचारप्राणि रात्रयम् । भगक्षतवे जन्म-मलरूप संसास्की बरणीमत वस्तुओंके विषयमें सुना है, परिचय प्राप्त किया है, तथा अनुभव मी किया है । किन्तु बो शुद्ध आत्माकी ज्योति मुक्तिकी कारणभूत है उसकी उपलब्धि उन्हें सुलभ नहीं हुई॥६॥ बो यात्या बरनोंक क्योचर है-विकस्पातीत है-उस आत्मतत्त्वके विषयमें प्रायः ज्ञान ही नहीं होता है, उसके विश्वमै सिति और भी कठिन है, तथा उसका अनुभव तो दुर्लभ ही है। वह बलवत्व अत्यन्त दुर्मम है ॥७॥ व्यवहारनय अज्ञानी मनको प्रतिबोधित करनेके लिये है, किन्तु शुद्ध निवास कोंक नात्र कारण है। इसीलिये मोसकी अमिलाषा रखनेवाला मैं ( पदमनन्दी) स्वके निमित्त शुद्ध नियनसके भाषसे प्रयोक्तीमत आत्मस्वरूपका वर्णन करता हूं॥ ८॥ व्यवहारनय असत्य पदार्थको रिस पस्नेवाल वा निश्वनय गवार्थ यातको विषय करनेवाला कहा गया है । जो मुनि शुद्ध निश्चयनयका सा लेते हैं ये उपट पर (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं ॥ ९॥ वस्तुका यथार्थ स्वरूप वचनके अगोचर है अर्थात् कह कनके द्वारा कहा नहीं जा सकता है। वह व्यवहारका आश्रय ले फरके ही वचनके द्वारा कहनेके योग होना है।हौ गुणों और पर्यायों आदिके विवरणसे सैकड़ों शाखाओं में विस्तारको प्राप्त होता है ॥१०॥ कि सज्जन मनुष्प सहारनपके वयसे ही मुख्य और उपचारभूत कथनको जानकर शुद्ध स्वरुपका सन लेते हैं, अतएव यह व्यवहार पूज्य (प्राथ) है ॥ ११ ॥ आत्माके विषयमें दृढ़ता ( सम्यग्दर्शन ), __wit। २'मोसो। परम पदम् । समितिवमरग। ५थये। रजा देशितः ये मुनयः परम पदंबन्धि । - -
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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