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________________ ११. निश्चयपश्चाशत् ] 598) दुर्लक्ष्य जयति पर ज्योतिर्चा गणः कपीन्द्राणाम् । जलमिव बन्ने यस्मिन्नलग्यमभ्यो बहिलठति ॥१॥ 539) मनसो ऽचिम्त्यं पाबामगोचरं यन्महस्तमोर्भिनम् । सानुभवमात्रगम्यं चिद्रूपममूर्तमव्यायः ॥२॥ 600) वपुरादिपरित्यक्ते मज्जस्यानम्पसागरे मनसि । प्रतिभाति यत्तदेकं जयति पर चिन्मयं ज्योतिः ॥ ३॥ 601 ) स जयति गुरुरीयान् यस्यामलवचनरश्मिभिर्ममिति । नश्यति सन्मोइतमो यदविषयो दिनकरादीनाम् ॥ ४॥ 602) आस्तां जराधिदुःख सुखमपि विषयोद्भय सतां दुःखम् । तैर्मन्यते सुखं यन्मुको लाप दुःसाध्या ॥ ५॥ 603 ) श्रुतपरिचितानुभूतं सर्व सस्य जन्मने सुबिरम्। नतु मुक्तये न सुलभा शुजारमज्योतिमपलब्धिः ॥ ६॥ तत् पर दुर्लक्ष्य ज्योतिर्जयति । यस्मिन् ज्योतिषि। स्वीन्द्राणां वाचा गणा समूहः । बहिः बाहो अठति । लक्षपः पार्था गमः । भलम्पमध्यः । कस्मिन् कामेव । वो जलमिव । पहिलठति ॥ १॥ चिद्रूपं महः । वः युष्मान । म्यात् रक्षतु । यन्महः । मनसः भचिन्नम् अगम्यम् । यन्महः बाचा अगोचरं तनोमिंगम् । यन्महः खानुभवमात्रराम्यम् । यन्महः भमा तज्योतिः रक्षतु ॥३॥ तदेक चिन्मय पर ज्योति जयति । यत् ज्योतिः प्रतिमाति भानन्दसागरे मनसि मजति। किंलक्षणे भानन्दसागरे। वपुराविपरित्यके शरीरादिरहिते ॥ ३ ॥ सः गरीमान् गरिछः गुरुः जयति यस गुरोः पमलवचनरश्मिभिः तन्मोहतमः भगिति मश्यति मम्मोहतमः दिनकरावीना अविषयः अगोचरः॥४॥ जराविवुःखम् पाखा कूरे विछ । विषयोद्भवम् अपि सुखम् । सतो साधूनाम् । दुःखम् । तैः साधुमिः परसुखम् । ममिलष्यते तस्मुखम् । मुजौ मोझे । मन्यते। पुनः । सा मुफिः । दुःसाध्या ॥५॥ अत्र संसारे । सर्वस्य जीवस । सर्व वस्तु सर्व विषयादिवस्त । मुरिनिरकासम् । जिस प्रकार जल वज्रके मध्यमें प्रवेश न पाकर बाहिर ही लुढ़क जाता है उसी प्रकार जिस उत्कृष्ट ज्योतिके मध्यमें महाकवियोंके वचनोंका समूह भी प्रवेश न पाकर बाहिर ही रह जाता है, अर्थात् जिसका वर्णन महाकवि भी अपनी वाणीके द्वारा नहीं कर सकते हैं, तथा जो बहुत कठिनतासे देखी जा सकती है वह उत्कृष्ट ज्योति जयवन्त होवे ॥१॥ जिस चैतन्यरूप तेजके विषयमें मनसे कुछ विचार नहीं किया जा सकता है, बचनसे कुछ कहा नहीं जा सकता है, तथा जो शरीरसे मिन्न, अनुभव मात्रसे गम्प एवं अमूर्त है। यह चैतन्यरूप तेज आप लोगोंकी रक्षा करे ॥ २॥ मनके बार शरीरादिकी ओरसे हटकर भानन्दरूप समुद्रमें डूब जानेपर जो ज्योति प्रतिभासित होती है वह उत्कृष्ट चैतन्यस्वरूप ज्योति जयवन्त होवे ॥ ३ ॥ जो अज्ञानरूप अन्धकार सूर्यादिकोंके द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता है यह जिस गुरुकी निर्मल बचनरुप किरणोंक द्वारा शीघ्र ही नष्ट हो जाता है वह श्रेष्ठ गुरु जयवन्त होवे ॥४॥ स्वत्व आदिके निमिक्से उत्पन्न होनेवाला दुख तो दूर ही रहे, किन्तु विषयभोगोंसे उत्पन हुआ सुल भी साधु जनोंको दुखरूप ही प्रतिभासित होता है । थे जिसको वास्तविक सुख मानते हैं वह सुख मुक्ति है और यह बहुत कठिनतासे सिद्ध की जा सकती है ॥ ५ ॥ लोकमें सब ही प्राणियोंने चिर कारसे HMMA nammarAARAARinarane सटिति। रस प्रती एवंविधा टीका पर्व-तत्पर ज्योतिः अपति । मत्पर ज्योतिः कवीन्द्रार्णा पाया दुर्लकई पत्र म्योतिः पाच गणः यसि मयः सन्न पहिरति कमिव बने. अमिव ॥१॥ अमति ४ योति पर जपति । ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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