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________________ पचनन्दि-पवार्षिशतिः [596:१०-१596) प्रैलोक्ये किमिहारित को ऽपि स सुरा किंषा नरः किं फणी पमानीर्मम यामि कातरतया यस्याश्रयं चापदि । पकं यत्परमेश्वरेण गुरुणा मि शेषवामहाभयं भान्तिलेशहरे हदि स्फुरति वेतचरमस्यद्भुतम् ॥ ४९ ॥ 597 ) तवमानसुधार्णवं लाहरिमिरं समुल्लासयन् सम्यागालिदिमणिका गोमानी पक्षा सद्विचालितभन्यकैरवकुले कुर्षम् विकासत्रिय पोगीतोषयभूधरे विजयते सदोधचन्द्रोदयः॥५०॥ म सकते ४८ ॥ एतत्वम् । परमेधरेण गुरुणा उकम् । चेत् यदि । सत्यम् अत्यनुतं मे इदि स्फुरति तदा इह त्रैलोक्ये स नेपिपुर: देवः । किम् अस्ति। वा भपा । स नरः किम् अस्ति । भषसः फणी शेषनामः । किम् अस्ति ! यस्मात् मम मी. मयं भवति। पुनः । थापदि सत्य कातरतया यस्स भाभयं यामि। किंलक्षणं तत्त्वम् । निःशेषवाञ्छाभयनान्तिदेशहरम् ॥ोगीन्द्रोदयभूषरे योगीन्द्र एव उदयभूधरः सदयाचलः तस्मिन् योगीन्द्रोदयभूषरे । सदोषचन्द्रोदयः निमयते। चन्द्रोदयः कि कुर्वन् । तत्वज्ञानसुधार्णवे तत्वज्ञान सुधासमुद्रम् । लहरिभिः । दूरम् अतिशयेन । समुहासयन भामरयम् । पुनः तृष्णापत्र विनिरिकम संकोचमुहां दक्षत् । सद्विचाश्रितभव्यकैरवकुळे विकाशभियं कुर्वन् विजयते ॥५॥ इति सदोषयोदयः ॥ १० ॥ हायमें ही सित समझना चाहिये ।। ४८ ॥ महान् परमेश्वरके द्वारा कहा हुआ जो चैतन्य तत्त्व समस्त इच्छा, भव, प्रान्ति और क्लेशको दूर करता है वह आश्चर्यजनक चैतन्य तत्त्व यदि हृदयमें प्रकाशमान है तो फिर तीनों लोकोंमें यहां क्या ऐसा कोई देव है, ऐसा कोई मनुष्य है, अथवा ऐसा कोई सर्प है। जिससे मुझे भय उत्पन हो अथवा आपत्तिके आनेपर मैं कातर होकर जिसकी शरणमें जाऊं ! अर्थात् उपर्युक्त पैतन्य स्वरूपके हवयमें स्थित रहनेपर कमी किसीसे भय नहीं हो सकता है और इसीलिये किसीकी शरणमे मी जानेकी आवश्यकता नहीं होती है ।। ४९॥ जो सोधचन्द्रोदय ( सम्यम्हानरूपी चन्द्रका उदय ) वसज्ञानरूपी अमृतके समुखको सस्वविचाररूप लहरोंके द्वारा दूरसे ही प्रगट करता है, तृष्णारूपी पत्तोंसे विचित्र ऐसे चितरूपी कमलको संकुचित करता है, तथा सम्यग्ज्ञानके आश्रित हुए भव्यजीवोरुप कुमुदोके समूहको विकसित करता है। वह सद्बोधचन्द्रोदय ( यह प्रकरण ) मुनीन्द्ररूपी उदयाचल पर्वतपर जयवन्त होता है।॥ ५० ॥ इस प्रकार सदोषचन्द्रोदय अधिकार समास हुआ ॥१०॥ १शविला सतलज्ञानसमुत्रम् ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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