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________________ wwwder -annmaawaranam [१०. सद्बोधचन्द्रोदयः] 548) यज्ञानमपि बुद्धिमानपि गुहा शलोन पई गिरा प्रोक्तं च तथापि चेतसि नृणां समाति वाकाथावत् । यत्र स्वानुमपस्थिते ऽपि विरला लक्ष्यं लभन्ते विरा सन्मोसकनिबन्धन विजयते मिसषमस्यद्भुतम् ॥१॥ 549) नित्यानित्यतया महानुसयानेकैकरूपत्षवत् चितवं सदसत्तया व गहन पूर्ण च शून्यं च यत् । तजीयादखिलश्रुताश्नयशुचिमानप्रमाभासुरो यस्मिन् पस्तुविचारमार्गचतुरो यः सोऽपि संमुह्यति ॥२॥ 550) सर्वसिणिमादिपङ्कजवने रम्ये ऽपि हित्वा रति योष्टिं शुचिमुक्तिसषमितां प्रत्यावरात्तवान् । खेतोवृत्तिनिरोधलग्नपरमप्राममोवाम्बुधृतः सम्यक्साम्पसरोषरस्थितिजुषे इसाय तस्मै ममः ॥ ३ ॥ तश्चितत्वम् अत्यनुत मोक्षकमिबन्धन विजयते । यत् चैतन्यतत्त्वम् । मिरा दाण्या । पहुं कथितुम् । गुरुः सहस्पतिः । शक: समर्थः न । किलक्षणः गुरुः । जानकापि बुद्धिमानपि । च पुनः। चेत् यदि । चेतन्यतत्व प्रोक्त तथापि मुर्गा तसिन समाति भाकाशवत् । यत्र तत्त्वे खानुमवस्थितेऽपि विरला नराः । लायं प्राधम् । लभन्ते । चिरात् दीर्घकालेन ॥ तचितवं जीयात् । यतत्वं निस्य-अनित्यतया । च पुनः । महत्तनुसया प्रदेशापेक्षया दीर्घलघुतया । अनेक-एकरूपत्वतः । सत्असतया गहन पूर्ण शून्य तवं वर्तते । यस्मिन् तरवे । सोऽपि समुत्पति । सः कः । यः भव्यः अखिलभुत-माश्रय-आधारशुविज्ञानप्रभाभासरः । पुना बस्तुविचारमार्गचतुरः । सोऽपि समुत्पति ॥ २ ॥ तस्मै ईसाब नमः । किंलक्षगाय ईसाय । चेतो. जिस चेतन तत्त्वको जानता हुआ भी और बुद्धिमान् भी गुरु वाणीके द्वारा कहनेके लिये समर्थ नहीं है, तथा यदि कहा भी जाय तो भी जो आकाशके समान मनुष्योंक हृदयमें समाता नहीं है, तथा जिसके स्वानुभवमें स्थित होनेपर मी विरले ही मनुष्य चिर कालमें लक्ष्य (मोक्ष) को प्राप्त कर पाते हैं; वह मोक्षका अद्वितीय कारणमूत आश्चर्यजनक चेतन तत्त्व जयवन्त होवे ।। १ ॥ जो चेतन तत्त्व नित्य और अनित्य स्वरूपसे, स्थूल और कृश स्वरूपसे, अनेक और एक स्वरूपसे, सत् और असत् स्वरूपसे, तथा पूर्ण और शून्य स्वरूपसे गहन है तथा जिसके विषयमें समस्त भुतको विषय करनेवाली ऐसी निर्मल ज्ञानरूप ज्योतिसे दैदीप्यमान एवं तत्वके विचारमें चतुर ऐसा मनुष्य भी मोहको प्राप्त होता है वह चेतन तत्त्व जीवित रहे । विशेषार्थ--वह चिद्रूप तत्त्व बड़ा दुरूह है, कारण कि भिन्न भिन्न अपेक्षासे उसका स्वरूप अनेक प्रकारका है । यथा- उक्त चिद्रप तत्त्व यदि द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा नित्य है तो पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा वह अनित्य मी है, यदि वह अनन्त पदार्थोको विषय करनेसे स्थूल है तो मूर्तिसे रहित. होनेके कारण सूक्ष्म भी है, यदि वह सामान्यस्वरूपसे एक है तो विशेषस्वरूपसे अनेक भी है, यदि वह स्वकीय व्यादिचतुष्टयकी अपेक्षा सत् है तो परकीय द्रव्यादिचतुष्टयकी अपेक्षा असत् भी है, तथा यदि वह अनन्तचतुष्टय आदि गुणोंसे परिपूर्ण है तो रूप-रसादिसे रहित होनेके कारण शून्य भी है। इस प्रकार उसका स्वरूप गम्भीर होनेसे कभी कभी समस्त श्रुतके पारगामी भी उसके विषयमें मोहको प्राप्त हो जाते हैं ।। २ ।। अणिमा-महिमा आदि आठ ऋद्धियोंरूप रमणीय समस्त कमलवनके रहनेपर मी जो . करिमानपि चेत् । पान- १२
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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