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________________ [610: २१ । narauraniurn पअनन्दि-पञ्चविंशतिः 510) सिदारमा परमः परं प्रविलसद्वोधः प्रबुदात्मना येनाकायि स किं करोति बहुभिर शासीय हिचिर। सस्य मोहतरोचिपलत्तनुर्भानुः करस्यो भवेत् भवान्तध्यसविधी स किं मृगयते रमपदीपादिकान् ॥ २५ ॥ 511) सर्वत्र व्युतकर्मबन्धनतया सर्वत्र सदर्शनाः सपासिलवस्तुजातविषयभ्यासकबोधत्विषः । सर्वध स्फुरदुमतोमतसदानन्दारमका मिश्मलाः सर्वश्रेष निराकुलाः शिवमुखं लिशा प्रयच्छन्तु नः ॥ २६ ॥ 512 ) आत्मोतुग्रहं प्रसिद्धपहियायामप्रभेदक्षणे महात्माम्यवसामसंगतलसस्सोपानशोभाम्वितम् । तत्रामा विभुरात्मनात्ममुहवो इस्तावलम्बी समा. बधानन्दकलषसंगतभुवं सिद्यः सदा मोदते ॥ २७ ॥ भावपते ॥२४॥येन मुमिना प्रकारमना । पर [परमः] श्रेष्ठ । सियास्मा । मज्ञायि हातः। किंलक्षणः परमात्मा । प्रविलसद्वोधः। सझानान् बहुभिः बहिर्वाचकैः शालेः किं करोति। यस्य पुंसः। ध्वान्तवसविधौ करस्थः भानुः सूर्यः भवेत् सकि रमप्रदीपादिकान् मृगपठे यसो यते। अमिनाया। कानु: शतरोचिषज्वलतनुः ॥ २५॥ सिद्धाः । मः अस्मभ्यम् । शिवमुखं प्रयच्छन्तु ददतु । किंलक्षणाः सिद्धाः । सर्वत्र च्युतकर्मबन्धनतया सर्वत्र सहर्शनाः केवलदर्शनाः । पुगः किंलक्षणाः सिद्धाः। सर्वत्र अखिलवस्तुजातविषयष्यासक्रवोधत्विषः सर्वपदार्थसमूहगोचराः आससंज्ञानवीतयः । पुनः किलक्षणाः सिद्धाः। सर्वत्र स्फुरदुमतोणतसत्-बानन्दात्मकाः । निश्चलाः । पुनः किसक्षणाः सिद्धाः । निराकुलाः । एवंभूताः सिखाः सुख वदतु ॥ २६ ॥ सिद्धा सहा मोदते । आत्मा। विभुः राजा । तत्र भात्मोतु गृह समाख्य मोदते। किलक्षणं गृहम् । लक्ष्यके विषयमें सम्बन्धको करता है वही बाण कहा जाता है । विशेषार्थ—जो माण अपने लक्ष्यका वेधन करता है वही बाण प्रशंसनीय माना जाता है, किन्तु जो बाण अपने लक्ष्यके वेधनेमें असमर्थ रहता है वह वास्तव वाण कहलानेके योग्य नहीं है। इसी प्रकार जो भव्य जीव प्रयोजनीभूत आत्मतत्त्वके विषयमें जानकारी रखते हैं वे ही वास्तवमें प्रशंसनीय हैं । इसके विपरीत जो न्याय, व्याकरण एवं ज्योतिष आदि अनेक विषयों के प्रकाण्ड विद्वान् होकर भी यदि प्रयोजनीभूत आत्मतत्त्वके विषयमें अज्ञानी हैं तो वे निन्दाके पात्र हैं । कारण यह कि आत्मज्ञानके विना जीवका कभी कल्याण नहीं हो सकता । यही कारण है कि व्यलिंगी मुनि बारह अंगोंके पाठी होकर भी भव्यसेनके समान संसारमें परिश्रमण करते हैं तथा इसके विपरीत शिवमति (भावनामृत ५२-५३) मुनि जैसे भव्य प्राणी केवल तुष-माषके समान आत्मपरविवेकसे ही संसारसे मुक्त हो जाते हैं ॥ २४ ॥ जिस विवेकी पुरुषने सम्यग्ज्ञानसे विभूषित केवल उत्कृष्ट सिद्ध आत्माका परिज्ञान प्राप्त कर लिया है वह वास पदार्थोका विवेचन करनेवाले बहुत शास्त्रों से क्या करता है। अर्थात् उसे इनसे कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता । ठीक ही है-जिसके हाथमें किरणों के उदयसे संयुक्त उज्वल शरीरवाला सूर्य स्थित होता है वह क्या अन्धकारको नष्ट करनेके लिये रलके दीपक आदिको खोजता है। अर्थात् नहीं खोजता है ॥२५ ।। जो सिद्ध जीव समस्त आत्मप्रदेशोंमें कर्मचन्धनसे रहित हो जानेके कारण सब आत्मप्रदेशोंमें व्याप्त समीचीन दर्शनसे सहित हैं, जिनकी समस्त वस्तुसमूहको विषय करनेवाळी ज्ञानज्योतिका प्रसार सर्वत्र हो रहा है अर्थात् जो सर्वज्ञ हो चुके हैं, जो सर्वत्र प्रकाशमान शाश्वतिक अनन्त सुखस्वरूप हैं, तथा जो सर्वत्र ही निश्चल एवं निराकुल हैं; ऐसे वे सिद्ध हमें मोक्षसुख प्रदान करें ॥ २६ ॥ जो आत्मारूपी उन्नत भवन प्रसिद्ध बहिरात्मा आदि भेदोंरूप खण्डों ( मंजिलों) से सहित तथा बहुत-सी आत्माके परिणामोंरूप सुन्दर सीढ़ियोंकी शोभासे संयुक्त है उसमें आत्मारूप मित्रके हाथका १ क श्रेष्ठं। १ भानु भवेत् । ३ क समूहः गोचर आसक, मप्रतौ तु शुटित-जात पत्रमत्र। ४ सुनतउन्नतोन्नत ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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