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________________ - 514 : ८-१९ ] ८. सिद्धस्तुतिः 513 ) सबैका सुगतिस्तदेव च सुखं ते एव ग्बोधने सिद्धानामपरं यदस्ति सकलं तन्मे प्रियं नेतरत् । इत्यालोच्य दृढं त एव च मया चिते धृताः सर्वदा तदूपं परमं प्रयातुमनसा हित्वा भयं भीषणम् ॥ २८ ॥ 514 ) से सिद्धाः परहिं विधायासमा महि मायो चच्मि यदेव तरखलु नमस्यालेस्यमालिष्यते । नामापि मुद्दे स्मृतं तत इतो भक्त्याथ वाचालितस्तेषां स्तोत्रमिवं तथापि कृतवानम्भोजनम्दी मुनिः ॥ २९ ॥ १५७ प्रसिद्ध बहिरात्मा-अन्तरारमा-परमात्माप्रभेदलक्षणम् । पुनः किंलक्षणम् आत्मगृहम् । बहु-आत्म-अध्यवसानसंगतलसल्सोपानशोभातिम् । किंलक्षणः आत्मा 1 विभुः । आत्मसुहृदः परमात्मना । हस्तावलम्बी । सिद्ध: निष्पन्नः । आनन्दकला संगतभुवं परमानन्दम् | सदा मोदते ॥ २७ ॥ सा एका सुगतिः । च पुनः । तदेव सुखम्। ते द्वे एव हम्बोधने । सिद्धानां यत् अपरं गुणम् (?) अस्ति । मे मम । तत्सकले प्रियम् इष्टम् । इतरत् अन्यत् । इष्टं न । इति मालोच्य विचार्य । ते एव सिद्धाः । या सर्वदा चित्ते धृताः । भीषणं भवं संसारं हित्वा परं तद्रूपं मनसा कृत्वा प्रयातु प्राप्नोतु ॥ २८ ॥ वे सिद्धाः वाचा विषया गोचराः न । किंलक्षण|ः सिद्धाः । परमेष्ठिनः । अतः कारणात् । तान् सिद्धान् प्रति । प्रायः बाहुल्येन । यवेव वच्मि तत्खलु । नमसि आकाशे । आलेख्यं चित्रम् । आलिख्यते । तथापि । अम्भोजनन्दी मुनिः पद्मनन्दी मुनिः । तेषां सिद्धानाम् । इदं स्तोत्रं कृतवान् । नामापि तेषां सिद्धानां नामापि । मुद्दे हर्षाय । स्मृतं कथितम् । ततस्तस्माद्वैतोः । अथ भक्ला करवा । इतः वाचकत्वात् वाचालितः । पद्मनन्त्री मुनिः इदं स्तोत्रं कृतवान् ॥ २९ ॥ इति सिद्धस्तुतिः ॥ ८ ॥ - आश्रय लेनेवाला यह आत्मारूप राजा आनन्दरूप स्त्रीसे अधिष्ठित पृथिवीपर चढ़कर मुक्त होता हुआ सदा आनन्दित रहता है || विशेषार्थ - जिस प्रकार अनेक सीढ़ियों से सुशोभित पांच-सात खण्डोंवाले भवनमें मनुष्य किसी मित्रके हाथका सहारा लेकर उन सीढ़ियों ( पायरियों ) आश्रयसे अनायास ही ऊपर अभीष्ट स्थान में पहुंचकर आनन्दको प्राप्त होता है उसी प्रकार यह जीव अधःप्रवृत्तकरणादि परिणामरूप सीढ़ियों पर से बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मारूप तीन खण्डोंवाले आत्मारूप भवनमें स्थित होता हुआ अपने आत्मारूप मित्रका हस्तावलम्बन लेकर ( आत्मलीन होकर ) शाश्वतिक सुखसे संयुक्त उस सिद्धक्षेत्र में पहुंच जाता है जहां वह अनन्त काल तक अबाध मुखको भोगता है ॥ २७ ॥ सिद्धोंकी जो गति है वही एक उत्तम गति है। उनका जो सुख है वही एक उत्तम सुख है। उनके जो ज्ञान दर्शन हैं वे ही यथार्थ ज्ञान-दर्शन हैं, तथा और भी जो कुछ सिद्धोंका है वह सब मुझको प्रिय है । इसको छोड़कर और दूसरा कुछ भी मुझे प्रिय नहीं है । इस प्रकार विचार करते हुए मैंने भयानक संसारको छोड़कर और उन सिद्धों के उत्कृष्ट स्वरूपकी प्राप्तिमें मन लगाकर अपने चिचमें निरन्तर उन सिद्धों को ही हड़ता पूर्वक धारण किया है । ॥ २८ ॥ वे सिद्ध परमेष्ठी चूंकि वचनोंके विषय नहीं हैं अत एव प्रायः उनको लक्ष्य करके जो कुछ भी मैं कह रहा हूं यह आकाशमें चित्रलेखनके समान है। फिर भी चूंकि उनके नाम मात्रका स्मरण भी आनन्दको उत्पन्न करता है, अत एव भक्तिवश वाचालित ( वकवादी ) होकर मैंने पद्मनन्दी मुनिने उनके इस स्तोत्रको किया है || २९ || इस प्रकार सिद्धस्तुति समाप्त हुई ॥ ८ ॥ १ ब सिद्धोः । २ क विभुः राजा आम । ३ म क निः सदा । ४ श चित्रामं । ५ तथा ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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