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________________ -3483 ] २. पानोपवेशनम् 245) भौवार्ययुक्तजनहस्तपरम्परातल्यावर्तनप्रपतवमरातिलिभार। अर्था पताः कृपणहमनन्तसौल्यपूर्णा यानिशमबापमतिस्वपन्ति ॥ ७ ॥ 246) उस्कापात्रमनगारमणुनताख्यं मध्य प्रतेन रहित सुदर्श समयम् । निदर्शनं नवनिकाययुत कुपाचं युग्मोजिसवं नरमपात्रमिदं च विवि ॥४८॥ 247 ) तेभ्यः प्रचमिह वामफलं जमानामेतविशेषणविशिष्टमदुएभावात् । अन्याहशे ऽथ हदये तदपि खमावाबुवाषवं भवति किं पहुमिचोमिः ॥४९॥ 248) स्वारि धान्यमयभेषभुकिशानदानानि ताने कषितानि महाफलानि ।। नाम्यानि गोकनकभूमिरयागनादिदामानि निमितमवयकराणि यमात् ॥ ५० ॥ सम् । बलि भुढे बलिभोजन करोति ॥ ६ ॥ अर्थाः रूपणगेई गताः । विलक्षणा अर्थाः । औदार्ययुक्तजनहस्तपरम्परा:-- भागम-म्पावर्तन-प्यापुम्नप्रसतणेदभरेण अतिखिमाः कृपभगेहम् । नार्थ सदारहितम् । भनिर्श सपन्ति । मनन्तसौरवपूर्णा व ॥ ४० ॥ इदम् पनगारम् उत्कृष्टपात्रं विधि मुनीम उत्तापात्र विति । मधुमवेन भाव मत मलमपात्र बानीहि । व्रतेन रहितं [ मदर्स ] दर्शनयुकं जपन्यपात्र आनीहि । निर्वर्शन दर्शनरहितम् । मतैनिकाययुतं व्रतसमूहसहितम् । अपात्र जानीहि । मुमोजिमात मर दर्शनरहित प्रतरहितम् । अपाय विमि जानाहि ।। ४८ ॥ रह जगति संसारे । तेभ्यः पूर्वोचपात्रेभ्यः । तम् अक्षम् । अनागो लोकानाम् । दानफल भवति । एतद्विशेषगविशिक्षा अयुष्टभावारप्रदत्तम् 1 उपात्रात् सरसफलम् । मप्परपात्रात् मध्यमफलम् । अघन्धपात्राजघन्यफलम् । कुपात्रात् कुत्सितफलम् । अपात्रात् अफलम् । मष भन्मादये। खभावात् खस मारममो भादः खमायः तस्मात् खमावात् । तदपि दानम् । चारवम् भनेकप्रकारम् । भवति । यो भनेकप्रकार स्तं भवति । बहुमिः मनोमिः किम् ॥४॥ यानि बसार अभयमेषजभुफिशावदामानि तानि महाफलानि कषितानि । निधितम् मन्यानि गोकनक-खण-भूमि-रव-गाना-नी-मादि-दामानि महाफलवायकानि न भवन्ति । सम्बत् । मायकसपि अन्य कौओंके समूहको बुलाकर ही बलि (बाद में अर्पित द्रव्य ) को खाता है ।।४६॥ वानी पुरुषों के हाथों द्वारा परम्परासे प्राप्त हुए जाने-आनेके विपुल खेदके मारसे मानो अत्यन्त व्याकुल होकर ही वह धन कंजूस मनुष्यके घरको पाकर अनन्त-सुखसे परिपूर्ण होता हुआ निरन्तर निर्वावस्वरुपसे सोता है ।। विशेषार्थ- दानी जन प्रास धनका उपयोग पात्रदानमें किया करते हैं । इसीलिये पात्रदानजनित पुण्यके निमित्तसे वह उन्हें मार बार प्राप्त होता रहता है । इसके विपरीत कंजूस मनुष्य पूर्व पुण्यसे प्राप्त हुए उस धनका उपयोग न तो पात्रदान करता है और न निजके उपमोगमें मी, यह केवल उसका संरक्षण ही करता है। इसपर अन्धकार उठोक्षा करते हैं कि वह घन यह सोच करके ही मानो कि "मुझे दानी जनोंके यहां बार बार जाने-आनेका असीम कष्ट सहना पड़ता है' कंजूस मनुष्यके घरमें आ गया है। यहां आकर वह बार बार होनेवाले गमनागमनके कष्टसे बचकर निश्चिन्त सोता है ॥४७॥ गृहसे रहित मुनिको उत्तम पात्र, अणुप्रतोंसे युक्त श्रावकको मध्यम पात्र, अविरत सम्यदृष्टिको जपन्य पात्र, सम्यग्दर्शनसे रहित होकर व्रतसमूहका पालन करनेवाले मनुष्यको कुपात्र, तशा दोनों ( सम्यग्दर्शन और व्रत ) से रहित मनुष्यको अपात्र समझो ॥ ४८ ॥ उन उपयुक्त पात्रोंके लिये दिये गये दानका फल मनुष्यों को इन्हीं (उच्चम, मध्यम, जघन्य, कुरिसत और अपात्र ) विशेषणोंसे विशिष्ट प्राप्त होता है ( देखिये पीछे श्लोक २०४ का विशेषार्थ) { अथवा बहुत कहनेसे क्या ! अन्य प्रकारके अर्थात् दूषित हृदयमें भी वह दानका फल स्वभावसे अनेक प्रकारका प्राप्त होता है ।। ४९ ।। अभयदान, औषपदान, आहारदान और शाल (ज्ञान ) दान ये जो चार दान कहे गये हैं वे महान् फलको देनेवाले हैं । इनसे मिन्न गाय, सुवर्ण, १को योचनं। २ मा निदर्शनं । । मुगमेक्सितं वसनं। ४ बिना।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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