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________________ २. दानोपदेशनम् 238) जातो ऽप्यजात इव स प्रियमाश्रितो ऽपि रङ्गः कलङ्करहितो ऽप्यगृहीतनामा । कम्बोरिवाश्रितमृतेरपि यस्य पुंसः शब्दः समुचलति नो जगति प्रकामम् ॥ ४० ॥ 239) वापि क्षितेरपि विभुर्जठरं स्वकीयं कर्मोपनीतविधिमा विदधाति पूर्णम् । किंतु प्रशस्यनुभवाविवेकितानामेतत्फलं यदिह संवतपात्रदानम् ॥ ४१ ॥ 240 ) आयासकोटिभिरुपार्जितमङ्गजेभ्यो यजीवितादपि निजाहयितं जनानाम् । वित्तस्य तस्य मितं विहाय या विपतय इति प्रवदन्ति सन्तः ॥ ४२ ॥ -240:2-42] परजन्मनि। लोमः। सर्वस्य यतेः वा सबैस्य जनस्य । सर्वान् गुणान् हन्ति स्फेटयति । किंलक्षणः लोभः । ज्जभपूजनहानिहेतुः उत्तमजन पूजन हानिहेतुः । अन्यत्र धर्मे (!)। तत्र तस्मिन् लोमे । विहितेऽपि कृतेऽपि । भो लोकाः । परं केवलम् । एकत्र जन्मनि दोषमात्रम् । प्रथयन्ति विस्तारयन्ति ॥ ३९॥ स पुमान् जातः उत्पन्नः । अपि । अजातः अनुत्पञ्चः । स पुमान् श्रियम् आश्रितोऽपि रहः । स पुमान् कडरहितोऽपि अगृहीतनामा निर्नामा सः । यस्य पुंसः पुरुषस्य शब्दः जगति विषये । प्रकामम् अत्यर्थम् । भो समुचलति । कस्य इव । कम्पोः इव शङ्खस्य इव । किंलक्षणस्य शङ्खस्य । आश्रितभृतेः जीवरहितस्य ॥ ४० ॥ श्रा अपि कुर अपि । कर्मोपनीत विधिना कर्मनिर्मित विधानेन । स्वकीय [ जठरं ] उदरम् । पूर्ण करोति । क्षिके भुवः । विभुः अपि राजा । स्वकीयं जठरं कमपनीतविधिना स्वार्जितकर्मणा । पूर्णम् । विदधाति करोति। किंतु इड् जगति विषये । प्रशस्पनुभव - श्रेष्ठमनुष्यपद - अर्थ-व्य-विवेकितानां विवेकानाम् । एतत्फलम् । यत् । संततं निरन्तरम् । पात्रदानं क्रियते ॥ ४१ ॥ मो भव्याः । तस्य उपार्जितवित्तस्यै नियतं निखितम् । वानम् । प्रविहाय त्यक्त्वा । अन्या विपत्तयः । सन्तः साधवः । इति । प्रमदन्ति कथयन्ति यत् इष्मम् आयास- प्रवास कोटिभिः उपार्जितम् । यत् द्रव्यम् । जनानां लोकानाम् । मनसेभ्यः पुत्रेभ्यः गुणोंको नष्ट कर देता है । वह लोग यदि गृह सम्बन्धी किन्हीं विवाहादि कार्योंमें किया जाता है तो लोग केवल एक जन्ममें ही उसके दोषमात्रको प्रसिद्ध करते हैं | विशेषार्थ-यदि कोई मनुष्य जिनपूजन और पात्रदानादिके विषयमें लोभ करता है तो इससे उसे इस जन्म में कीर्ति आदिका लाभ नहीं होता, तथा भवान्तर में पूजन-दानादिसे उत्पन्न होनेवाले पुण्यसे रहित होनेके कारण सुख भी नहीं प्राप्त होता है। इस प्रकार जो व्यक्ति धार्मिक कार्यों में लोभ करता है वह दोनों ही लोकोंमें अपना अहित करता है। इसके विपरीत जो मनुष्य केवल विवाहादिरूप गार्हस्थिक कार्योंमें लोभ करता है उसका मनुष्य कृपण आदि शब्दक द्वारा केवल इस जन्ममें ही तिरस्कार कर सकते हैं, किन्तु परलोक उसका सुखमय ही वीतता है । अत एव गाईस्थिक कामों में किया जानेवाला लोभ उतना निन्ध नहीं है जितना कि धार्मिक कामोंमें किया जानेवाला लोभ निन्दनीय है ॥ ३९ ॥ मृत्युको प्राप्त होनेपर शंखके समान जिस पुरुषका नाम संसारमें अतिशय प्रचक्ति नहीं होता वह मनुष्य जन्म लेकर भी अजन्मा के समान होता है अर्थात् उसका मनुष्य जन्म लेना ही व्यर्थ होता है । कारण कि यह लक्ष्मीको प्राप्त करके भी दरिद्र जैसा रहता है, तथा दोषोंसे रहित होकर भी यशस्वी नहीं हो पाता ॥ ४० ॥ अपने कर्मके अनुसार कुत्ता भी अपने उदरको पूर्ण करता है और राजा भी अपने उदरको पूर्ण करता है । किन्तु प्रशंसनीय मनुष्यभव, धन एवं विवेकबुद्धिको प्राप्त करनेका यहां यही प्रयोजन है कि निरन्तर पात्रदान दिया जाये || ४१|| करोड़ों परिश्रमोंके द्वारा कमाया हुआ ओ धन पुत्रों और अपने जीवनसे भी लोगों को अधिक प्रिय होता है निश्वयसे उस धनके लिये दानको छोड़कर जन्य सब विपत्तियां ही हैं, ऐसा साधुजन कहते हैं। विशेषार्थ मनुष्य भनको बहुत कठोर परिश्रमके द्वारा प्राप्त करते हैं । इसीलिये वह उन्हें अपने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय प्रतीत होता है। यदि वे उसका सदुपयोग ४ जनाकोटिभिः । १ बेला टीका बाि २ कुरः। 9
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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