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________________ Manianmanaanema vardhannnnr पानिपचितिः [18:- 212) मूले सुखानु भापति वर्षमाना भावाि सरिविवानिशमासमुद्रम् । भरपी सररिपुवक्रम यतीन्द्रदामपुण्यात्पुरः सह यशोभिरतीसफेनैः ॥ १४ ॥ 318) माया कुतो एहगते परमात्मबोध शुशात्मनो भुवि यतः पुरुषार्थसिदिः। पागम्युनगंड पनुर्विषता करता सा लीलये रुतपायजमानुषंगात् ॥ १५ ॥ 14) मामापिपासारति मोक्षपथस्य साचोराशु मयं मजति तारित समस्तम् । पो ममेषजमठादिकतोपकारा संसारमुचरति सोऽभ नरोम चिनम् ॥ १६ ॥ 215) कि ग्रहाः किमिह रे गहिणोतुषामतर्मनस्तु मुनयो न हि संचरन्ति । साक्षापय स्थतिवशाचरणोदकेन नित्यं परिणितपराप्रशिराप्रदेशाः ॥ १७॥ गाम्यापारेष । भर्षितानि पापानि तेषी पापाना पुचः । खचीकतानि कुपीकतानि ॥ १३॥ लक्ष्मीः मुझे तनुः खोच । सक्नु पथात् बगोमिमा अनिबर्षमाना । सरधिपस्वस भव्यजीवस्य । पुरस्बप्रे। शिव मावत मोक्षपर्यन्तम् । पावति गच्छति । अमाव। यतीनवानपुयात् + सा कामीः। मेव । सरिदिन मरी इस । भिक्षणा सरित् । मूरे तनुः सम्बी । सद्ध पवात् । भवीय सह पनि वर्षमभा। पावत्या समुद्रावति समुद्रपर्यन्त गच्छति ॥ १४ ॥ भुवि षिष्याम् । गृहगते पहस्वजने। प्रायः बास्केन । परमात्मबोषः परमात्मज्ञानम् । कुतः। बतः पुश्वार्थसिदिः । शुद्धात्मनः मुनेः भवति । मनु की विस। पुनः सर्विषतः वानात् । सा पुलाधिषिः । लीलया एकरस्वागता माता लक्षगात् दानात् । तराशनामुषमात् छतः पानयन सु गति येन बानेन तत्तस्मात् ॥ १५ ॥ यः भन्यः भावकः । मोक्षपवस सापोः मोक्षपस्क्तिव मुनापरले । गानापि स्मरी । तस श्रावकत्व । समय पुरित पापम् । भाणु मीश्रेण । क्षर जगति । र भावकः भवमेषमहावितोपर मज-भोजन-मेषज-मोषध-मह-सानावित-सपकारसबुकमबर नरः। संसारम् उत्तरतिपत्र संसार परमे।विन मावन १६॥ मनु इति वितः । वे कि पक्षः । स नरोके । ते रहियः गस्वरः । मेवा खाणाम् । भाव लिहीन किये गये गृहसके प्रत नहीं करते हैं॥ १३ ॥ सम्यग्दृष्टि पुरुषकी लक्ष्मी मूल्में अस्प होकर भी तत्पमात् मनिराजको दिये गये दानसे उत्पन्न हुए पुण्यके प्रभावसे कीर्तिके साथ निरन्तर उपरोज वृद्धिको प्राप्त होती हुई मोमपर्यन्त जाती है। जैसे-नदी मूल्में इञ्च होकर भी अतिशम दीप्त फेनके साब समोर एडिंगत होकर समुद्र पर्यन्त जाती है ॥ विशेषार्थ-जिस प्रकार नदीके उगमस्थानमें उसका विस्तार सबपि बहुत ही मोबा रहा है, फिर भी वह समुखपर्यन्त पहुंचने तक उपरोर बढ़ता ही बास्य है। इसके साथ साब नदीका फेन मी उसी कमसे बढ़ता जाता है। उसी प्रकार सम्बम्हष्टि पुरुषकी पन-सम्पति मी यचपि मूसमें बहुत थोड़ी रहती है तो भी वह आगे भक्तिपूर्वक किये गये पात्रदानसे जो पुष्पकम होता है उसके प्रभावसे मुक्ति प्राप्त होने तक उत्तरोत्तर वृद्धिंगत ही होती जाती है। उसके साथ ही उक दास श्राराकी कीर्तिका प्रसार मी बढ़ता जाता है ॥ १४ ॥ जगत्में जिस उत्कृष्ट मात्मखलपके शानसे शुद्ध आत्माके पुरुषार्थकी सिधि होती है वह आत्मज्ञान गृहम खित मनुष्य के प्रायः कहांसे हो सकता है। अर्थात् नहीं हो सकता । किन्तु वह पुरुषार्थकी सिद्धि पात्र जनोंमें किये गये चार प्रकारके पानसे अनायास ही हस्तगत हो जाती है ।॥ १५ ॥ जो मनुष्य मोक्ष मार्गमें स्थित साधुके केवल मामका भी सरण करता है उसका समस्त पाप चीन ही नाशको प्रास हो जाता है। फिर जो मनुष्य उक साधुका भोजन, भौषषि और मठ ( उपाश्रय ) आदिके द्वारा उपकार करता है वह यदि संसारसे पार हो जाता है तो इसमें मला आश्चर्य ही क्या है। कुछ भी नहीं ॥ १६॥ जो मुनिजन साक्षात् अपने पादोदकसे गृहगत पूपिवीके मममागको सदा पवित्र किया करते है ऐसे मुनिजन जिन गृहकि मीतर १करनानुस्वाप । सरक। महसक्ने। मनुस्वः। स पलितानीवरम ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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