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________________ -151:१-१५१] १. धर्मोपदेशामृतम् इस्यास्था स्थिरचेतसो इढतरं साम्यावनारम्भिणः संसारायमस्ति किं पदि तदप्यन्यत्र का प्रत्ययःn १४८॥ 149) किं लोकेन किमाश्रयेण क्रिमय ध्येण कायेन कि कि वाग्भिः किमुतेन्द्रियैः किमसुभिः किं तैर्विकल्पैरपि । सर्वे पुद्गलपर्यया पत परे त्वत्ता प्रमसो भवन् नात्मभिरभिश्रयस्यति तरामालेन किं बन्धनम् ॥ १४९ ॥ 150) सतताभ्यस्तभोगानामयसरमुखमात्मजम्। अप्यपूर्व सदित्यास्था चिसे यस्य स तत्वविद ॥ १५० ॥ 151) प्रतिक्षणमयं जनो लियामाहालातरः क्षुधादिभिरभिश्रयसदुपशान्तये सादिकम् । तदेव मनुते सुखं श्रमपशायदेवासुख, समुलसति कछुफावणि यथा शिलिखेदनम् ॥ १५१ ॥ चेतसः जीवस्य । साम्यातू । मनारम्भिणः परिम्मरहितस्य । संसाराद छतरं मयै कमस्ति । यदि तत् तव अन्यत्र परवस्तुनि। का प्रत्ययः कः विश्वासः ॥ १४ ॥बत इति खेदे। भो भास्मन् । लेकेन किं प्रयोजनम् । भो श्रात्मन् । बाश्रयेण कि प्रयोजनम् । भो आत्मन् द्रव्येण अथवा कायेन कि प्रयोजनम् । भो हंस । वाग्मिः वचने कि प्रयोजनम् । अत महो। इन्द्रियः कि प्रयोजनम् । भो बाल्मन् मसुभिः प्राणः कि प्रयोजनम् । भो आत्मन् तेर्षिकरुपैरपि प्रियोजनम् । अपि सर्वे पुद्रलपर्यायाः। भो भात्मन् स्वतः सकाशात् । परे सर्व पदार्शः भिकाः । भो आस्मन् त्वं प्रमत्तः भवन् सन् । एभिः पूर्वोक्तैः विकल्पैः कृत्वा । मतितराम् अतिशयेन । मालेन बुथैव । बन्धनं किम् भमिनयहि आभयसि ॥ १४९॥ सततं निरन्तम् । अभ्यस्तभोगाना मुखम् अपि । असद अविद्यमानम । बारम सुखम् अपूर्व सत् विद्यमानम् । यस्य वित्त इति आस्था स्थितिः अस्ति । स पुमान् । तत्त्ववित् तस्ववेत्ता स्यात् ॥ १५.॥लियते निश्चितम् । अयं जनः लोकः । प्रतिक्षणं समय समय प्रति । अधादिमिः अमःमातुरः । तपशान्तये चार-उपशान्तये । अन्नादिकं अभियन् । तदेव सुखं मनुते । कस्मात् । भ्रमवशात् । यदेव असुखं तदेव सुख मनुते । यथा कस्छुकान समुलसति सति शिलिखेइन सुखं मनुते ॥ १५१ ॥ पर मुनिः इति चिन्तयति । मारमा marmnanmamananmarne amannanaanana m गया है तथा जो समताभावको धारण करके आरम्भसे रहित हो चुका है उसे संसारसे क्या भय है ! कुछ भी नहीं । और यदि उपर्युक्त हड़ श्रद्धानके होते हुए भी संसारसे भय है तो फिर और कहां विश्वास किया जा सकता है। कहीं नहीं ॥ १४८ ॥ हे आत्मन् ! तुझे लोकसे क्या प्रयोजन है, आश्रयसे क्या प्रयोजन है, बन्यसे क्या प्रयोजन है, शरीरसे क्या प्रयोजन है, बचनोंसे क्या प्रयोजन है, इन्दियोंसे क्या प्रयोजन है, प्राणोंसे. क्या प्रयोजन है, तथा उन विकल्पोंसे मी तुझे क्या प्रयोजन है ? अर्थात् इन सबसे तुझे कुछ मी प्रयोजन नहीं है, क्योंकि, वे सब पुद्गलकी पर्यायें हैं और इसीलिये तुमसे भिन्न हैं। तू प्रमादको प्राप्त होकर व्यर्थ ही इन विकल्पोंके द्वारा क्यों अतिशय बन्धनका आश्रयण करता है ? ||१४१ ।। जिन जीवोंने निरन्तर भोगोंका अनुभव किया है उनका उन भोगौसे उत्पन्न हुआ सुल अवास्तविक (कल्पित) है, किन्तु आत्मासे उत्पन्न सुख अपूर्व और समीषीन है। ऐसा जिसके हृदयमें दृढ़ विश्वास हो गया है वह तत्त्वज्ञ है ॥ १५० ॥ यह प्राणी प्रतिसमय क्षुषा-तृषा आदिके द्वारा अत्यन्त तीन दुःखसे व्याकुल होकर उनको शान्त करनेके लिये अन्न एवं पानी मादिका आश्रय लेता है और उसे ही अमवश सुख मानता है। परन्तु वास्तवमै वह दुःख ही है। यह सुखकी कल्पना इस प्रकार है असे कि खुजलीके रोगमें अमिके सेकसे होनेवाला सुख ॥ १५१ ।। यदि १ ममतवेति योजना का नास्ति ।
SR No.090317
Book TitlePadmanandi Panchvinshati
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, & Spiritual
File Size11 MB
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