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________________ १८० : पद्मवरित और उसमें प्रतिपादित संस्कृति १३७ भवन में डरते-डरते उन्होंने के समझ पैदल सैनिक मयभीत हो गए और उद्विग्न होकर भागने लगे। बाद में उनके यथार्थ रूप को जानने वाले अङ्गद ने उन पैदल सैनिकों को बहुत समझाया तब बड़ी कठिनाई से वे लोग वापिस लोटे । ३५८ इस प्रकार प्रवेश किया जिस प्रकार की मृगों झुण्ड सिंह के स्थान में प्रवेश करत है। बहुत से द्वारों को लांघकर जब से आगे जाने में असमर्थ हो गए तब सघन भवनों की रचना में जन्मान्ध के समान इधर-उधर भटकने लगे । १३९ वे इन्द्रनीलमणिनिर्मित दीवालों को देखकर उन्हें द्वार समझने लगते थे और स्फटिक मणियों से खचित भवनों को आकाश समझ उनके पास जाते थे जिसके फलस्वरूप दोनों ही स्थानों में शिलाओं से मस्तक टकरा जाने के कारण ये गिर जाते थे । वे अत्यधिक माकुलता को प्राप्त होते थे और वंदना के कारण उनके नेत्र बन्द हो जाते थे । २४० किसी तरह उठकर आगे बढ़ते तो दूसरी कक्ष में पहुँचकर फिर आकाशस्फटिक की दीवालों में वेग से टकरा जाते थे । *४९ उनके पैर और घुटने टूट रहे थे तथा वे ललाट की चोट से तिलमिला रहे थे । ऐसी स्थिति में वे लौटाना चाहते थे पर उन्हें निकलने का मार्ग ही नहीं मिलता था । ३४२ जिस किसी प्रकार इन्द्रनीलमणिमय भूमि का स्मरण कर वे लौटे तो उसी के समान दूसरी भूमि देख उससे छकाए गए और पृथ्वी के नीचे जो घर बने थे उनमें जा गिरे। बाद में कहीं पृथ्वी फट तो नहीं गई इस शंका से दूसरे घर में गए और वहाँ इन्द्रनीलमणिमय जो भूमियाँ थी, उनमें जान जानकर घोरे-धीरे कदम बढ़ाने लगे । १४४ कोई एक स्त्री स्फटिक की सीढ़ियों के ऊपर जाने के लिए उद्यत भो, उसे देखकर पहले तो उन्होंने समझा कि यह स्त्री अर ३३७. पर्वतेन्द्रगुहाकारे गम्भीरे भवनद्वारे महारत्न विनिर्मिते | मचितोरणभासुरे । पदम ०७१।१८ । अञ्जनाद्विप्रतीकाशानिन्द्रनीलमयान् गजान् । स्तिगण्डस्थलान् स्थूलदन्तानरयन्तभासुरान् ॥ पद्म० ७१।१९ । सिहवालांदच तन्मूर्द्धन्यस्ताङ्ग्रीनृद्वालधीन् । दंष्ट्राकरालवदनान् भीषणाक्षात् सुकेसरान् || पद्म० ७११२० । दुष्ट्वा पादचरास्त्रस्ताः सत्यम्याला मिशङ्किताः । पलाधितुं समारब्धाः प्राप्ता विह्वलतां पराम् || पद्म० ७१।२१ । ३३८. पद्म० ७११२२ । ३३९. पद्म० ७१।२३-२४ १ ३४० वही, ७१ । २५-२६ । २४२. वही, ७१।२८ । ३४४. वही, ७१।३० । ३४१. वहीं, ७१२७ । ३४३. वही, ७१।२९
SR No.090316
Book TitlePadmcharita me Pratipadit Bharatiya Sanskriti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages339
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Culture
File Size6 MB
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