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________________ २ पद्मचरित और उसमें प्रतिपादित संस्कृति लिखा हुआ प्राप्त कर यह रविषेण का प्रयत्न प्रकट हुआ है ।" ग्रन्थ के अन्तिम पर्व में इसी प्रकार का उल्लेख मिलता है ।" तदनुसार समस्त संसार के द्वारा नमस्कृत श्री भान जिनेन्द्र ने पद्मभूमि का जो भारत कहा या वहीं इन्द्रभूति ( गौतम गणधर ) ने सुधर्मा और जम्बूस्वामी के लिए कहा । वही जम्बूस्वामी के प्रशिष्य उत्तरवाग्मी आचार्य के द्वारा प्रकट हुआ। ये उत्तरवाग्मी कौन थे ? इसके विषय में अभी तक कोई जानकारी नहीं प्राप्त हुई। इनके द्वारा लिखित राम कथा भी आज उपलब्ध नहीं है । रामकथा सम्बन्धी प्राकृत की सबसे प्राचीन रचना विमलभूरि कृत पउमपरियं है। पउमचरियं तथा पद्मचरित को मिलाकर देखने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि दोनों का कथानक सर्वथा एक है। दोनों को परस्पर देखने से इसमें कोई सन्देह नहीं रहता कि व एक दूसरे के भाषात्मक रूपान्तर मात्र हैं ।" किसने किसका अनुवाद किया, यह यहाँ विचारणीय हैं। रविषेष ने अपनी रचना विक्रम सं० ७३४ में पूर्ण की, इसका उन्होंने ग्रन्थ में ही उल्लेख किया है । इस पर किसी को विवाद नहीं है। विमल सूरि ने वीर नि० सं० ५३० या वि० सं० ६० के लगभग पउमचरियं की रचना की " इसके विषय में विवाद हैं। डॉ० हर्मन जैकोबी उसकी भाषा और रचना शैली पर से अनुमान करते हैं कि वह ईसा की तीसरी चौथी शताब्दी की रचना है । डॉ० की, ' 1 ४. वर्तमान जिनेन्द्रोक्तः सोऽयमथों गणेश्वरम् । : इन्द्रभूर्ति परिप्राप्तः सुधर्म धारणीभवम् || पद्म० १ । ४१ । प्रभवं क्रमतः कीर्ति ततोऽनुत्तरवाग्मिनम् । लिखितं तस्य सम्प्राप्य रथेर्यत्नोऽयमुद्गतः । पद्म० १।४२ । ५. निर्दिष्टं सकलैर्नतेन भुवनेः श्री वद्ध' मानेन यत् । तएवं वासवभूतिना निगदितं जम्बो प्रशिष्यस्य च । शिष्येणोतरवाग्मिता प्रकटितं पद्मस्य वृतं मुनेः । श्रेयः साधुसमाधिकिरणं सर्वोत्तमं मङ्गलम् || पद्म० १ ३२१६७ ॥ ६. जैन साहित्य और इतिहास ( नाथूराम प्रेमी), पृ० १०२-१०८ । ७. पंचेन वासया दुसमाए तीसबरम संजुत्ता | बीरे सिविए सभी निवद्ध इमं चरियं ॥ पउमचरियं (जैन साहित्य और इतिहास, पृ० ८७) ८. एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रिलिजन एण्ड ईथिक्स, भाग ७, पृ० ४३७ और मार्बन रिव्यू दिस० सन् १९१४ । ९. कीच संस्कृत साहित्य का इतिहास |
SR No.090316
Book TitlePadmcharita me Pratipadit Bharatiya Sanskriti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages339
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Culture
File Size6 MB
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