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________________ ग्यायरत्नसार : षष्ठ अध्याय । ६३ व्यवहारामास : सूत्र-काल्पनिक तव्य-पर्या विभागाभिप्रायस्तवाभासः ॥१६॥ व्याख्या--द्रव्य और पर्याय का विभाग सत्य है, काल्पनिक नहीं है ऐसा अभिप्राय व्यवहार नय का है । इसके विपरीत जो अभिप्राय है वह व्यवहाराभास है। इस व्यवहाराभास में चार्वाक दर्शन परिगणित हुआ है क्योंकि वह ऐसा मानता है कि द्विचन्द्रदर्शन की तरह यह सब सुवर्णादि द्रव्य और उसकी कुण्डलादि रूप पर्यायें पारमार्थिक नहीं है। केवल काल्पनिक ही है ॥१६|| पर्यायाथिकनय के भेद : सूत्र---पर्यायाथिकनयश्चतुविधः ऋजुसूत्र-शब्द-समभिरूढवंभूत मेवात् ॥१७॥ व्याख्या-पर्यायाथिकनय चार प्रकार का है. ऋजुसूत्रनय, शब्दनय, समभिरूढनय और एवंभूतनय पर्यायाथिकनय केवल पर्याय को ही विषय करता है। पर्याय जिसके आश्रित रहती है ऐसे द्रव्य को वह विषय नहीं करता किन्तु उसे गौण कर देता है । जो उत्पन्न होता है और विनष्ट होता है 'उसका नाम पर्याय है । इस पर्याय को लेकर चलने वाली विचारधारा का नाम पर्यायाथिकनय है ।। ऋजुसूत्रनय : सूत्र-वर्तमान समयमात्र पर्यायग्राही नय ऋजुसूत्रः ।।१८।। व्याख्या--पदार्थ की वर्तमान समय की ही पर्याय को जो अभिप्रायविशेष ग्रहण करता है उसका नाम ऋजुसूत्रनय है । ऋ जुसुत्रनय को पर्यायाथिकनय का भेद इसीलिये कहा गया है कि वह पर्याय को वर्तमान काल में हो रही पर्याय को ही विषय करता है, न वह भूत पर्याय को विषय करता है और न भविष्यत में होने वाली पर्याय को विषय करता है । इसकी दृष्टि में विनष्ट हो जाने से भत पर्याय और आगे होने वाली होने से भविष्यत पर्याय का अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया है। इसी कारण वह उन्हें अपना विषय नहीं बनाता है ॥१८॥ जुसूत्र नयाभास सूत्र-द्रव्यापलापी तु सदाभासः ।।१६॥ व्याख्या-एकान्त से द्रव्य का निषेधक जो अभिप्राय है वह ऋजुसूत्रनयाभास है। इस ऋजुसूत्रनयाभास में बौद्धों की विचारधारा परिगणित हुई है । क्योंकि वे एकसमयमात्रभावी पर्याय को ही स्वीकार करते हैं । उस पर्याय का आधारभूत जो द्रव्य है उसका वे अपलाप करते हैं। ऋजुसूत्रनय द्रव्य को गौण करके पर्याय को प्रधान करता है। वह द्रव्य का अपलाप नहीं करता है। परन्तु ऋजुसूत्रनयाभास इससे सर्वथा विपरीत बृत्ति वाला है ।।१९।। प्राब्दमय: सूत्र-कालाविभेदेन वाच्यार्य अवशोऽभिप्रायः शवनयः ॥२०॥ ध्याख्या-काल आदि के भेद से शब्द के अर्थ में भेद मानने वाला जो अभिप्राय है वह शब्दनय है । यह शब्दानय, समभिरूनुनय और एवं भूतनय ये तीन नय शब्दों के अनुसार उनके वाच्य अर्थ में भेद मानते हैं इसलिये इन्हें शब्दमय कहा गया है। शब्दनय क्रिया के भेद से, लिंग के भेद से, कारक के
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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