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________________ न्यायरत्नसार : षष्ठ अध्याय रूप पर्याय की विवक्षा मुख्य रूप से हुई है और सत्त्व को गौण रूप से हुई है क्योंकि सत्त्व को चैतन्य का विशेषण बनाया गया है। इसी तरह जब कोई ऐसा कहता है कि पर्याय वाली वस्तु द्रव्य है-इस प्रकार का यह कथन वरतु और द्रव्य को प्रकट करने वाला है । यहाँ ये दो धर्मीरूप द्रव्य मुख्य और गौण करके कहे गये हैं । इसमें मुख्य 'द्रव्य' है और 'पर्यायवाली वस्तु' यह गौण हैं। क्योंकि वह द्रव्य का विशेषण बनाई गई है। इसी प्रकार जब कोई ऐसा कहता है कि विपवासक्त जीव एक क्षणभर तक मुखी रहता है तो यहां पर विशेष्य होने के कारण जीव 'द्रव्य प्रधान है और सुखात्मकता उसकी पर्याय गौण है । इन पूर्वोक्त उदाहरणों से हम यह जान सके हैं कि नैगममय ने द्रव्याथिकनय का भेद होने के कारण द्रव्य को ही मुख्य रूप से विषय किया है ॥८॥ नममनयाभास : सूत्र---पर्यायवयाविषकेकान्ततो भिन्नत्वाभिप्रायस्तदाभासः ।।६।। ध्याख्या-दो गुणरूप पर्यायों में, दो द्रव्यों में एवं द्रव्य और पर्यायों में गर्वथा भिन्नता ही है ऐसा जो अभिप्राय है वही नैगमनयाभास है । यह नो हम ममझा ही चुके हैं कि आर्हत सिद्धान्त में म्याद्वाद के सिवाय एकान्नवाद को स्थान नहीं है अनः दो पर्यायां में, दो द्रव्यों में और द्रव्य पर्याय में कथञ्चिन्– किसी अपेक्षा ही भेद है, सर्व या नहीं। अतः इनमें सर्वथा भद की मान्यता नंगमनयाभाम है ।।९।। संग्रहनय : सूत्र-सर्वतन्त्र स्वतन्य सत्तामात्रग्राही संग्रहमयः परापर भेदाच्च द्विविधः ।।१७॥ व्याख्या सर्वतन्त्र स्वतन्त्र सत्ता मात्र को विषय करने वाला जो नय है उसका नाम संग्रहनय है। यह संग्रहनय पर-संग्रहनय और अपर-संग्रहनय के भेद से दो प्रकार का है। सत्त्व, द्रव्यत्व, सूवर्णव आदि रूप जो जाति है वह सर्बतन्त्र स्वतन्त्र सत्ता है । इस सत्ता को ही जो प्रधान रूप से ग्रहण करने वाला वक्ता का अभिप्राय विशेष है वहीं संग्रहह्नय है । संग्रह नय' का विषय सामान्य है और यह सामान्य पर और अपर के भेद से दो प्रकार का कहा गया है । समस्त पदार्थों में बिना किसी भेदभाव के युगपत् रहने वाली जो सत्ता है उसका नाम पर-सत्ता है। पर सत्ता की अपेक्षा जिमका आधार क्षेत्र काम होता है वह अपर-सत्ता है । जैसे ---सत्त्व यह महासत्ता है, क्योंकि यह एक माथ जीव गुद्गलादिक ममस्त पदार्थों में रहती है । इसी प्रकार से द्रव्यत्व भी महासत्ता है क्योंकि यह भी जीवादिक समस्तु द्रव्यों में युगपत् रहती है । सुवर्णत्व यह अपर सत्ता है क्योंकि इसका आधार क्षेत्र केवल स्वर्णरूप व्यक्ति ही है जीवादिक द्रव्य नहीं । संग्रहनय मुख्य रूप से इमी पर-सत्ता और अपर-सत्ता को अपना विषय बनाता है ॥१०|| पर-संग्रहनय : सूत्र-सकलपदार्थसार्थ व्यापिसत्ताधीनोऽभिप्रायविशेषः परसंग्रहः ।।११॥ व्याख्या समस्त पदार्थ समुह में मुगपत् व्याप्त होकर रहने वाली जो सत्ता है वह पर-सत्ता है । यही पर-सत्ता समस्त पदार्थों को अपने द्वारा एकात्व में प्रविष्ट कराती है क्योंकि विश्व का ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है जो सत्ता से रहित हो । इसका दूसरा नाम पर-सामान्य भी है ।।११।।
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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