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________________ न्यायरनसार : तृतीय अध्याय अर्थ-इसका दूसरा भेद प्रतिषेधरूप विधिसाधक है । क्योंकि इसमें जो हेतु दिया जाता है वह तो प्रतिषेवरूप होता है और साध्य विधिरूप होता है । यह पाँच प्रकार की कही गई है, जैसे साध्यविरुद्ध कार्यानुपलब्धि १, साध्यविरुद्ध कारणानुपलब्धि २, साध्यविरुद्ध स्वभावानुपलब्धि ३, साध्यविरुद्ध व्यापकानुपलब्धि ४, और साध्यविरुद्ध सहचरानुपलब्धि ५, इनका प्रत्येक को स्पष्टीकरण सूत्रकार स्वयं आगे सूत्रों द्वारा करते हैं । ।।२।। साध्यविरुद्धकार्यानुपलब्धि का उदाहरण :--- सूत्र-साध्यविरुद्ध कार्यानुपलब्धिर्यथा--अस्मिनपुरुष रोगातिशयो नीरोगचेष्टानुपलम्मात् ॥६३॥ अर्थ-इस अनुपलब्धि में साध्य से विरुद्ध के कार्य की अनुपलब्धि विवक्षित हुई है । अतः जहाँ साध्य से विरुद्ध के कार्य की अनुपलब्धि होती है, वहाँ साध्य के सद्भाव को ही सिद्धि होती है। जैसे—इस पुरुष में रोग का अतिशय है क्योंकि नीरोग चेष्टा देखने में नहीं आ रही है। यहां पर साध्य रोगातिशय है से बिस्दानीरोगता है और इसका कार्य मरख की प्रसन्नता आदि का व्यापारविशेष है। इसकी दुममें अनुपलब्धि है । इससे परोक्षभूत भी रोगातिणय का सद्भाव अनुभित हो जाता है । ॥६२|| साध्यविरुद्धकारणानुपलब्धि का उदाहरण -- सूत्र-साध्यविरुखकारणानुपलब्धिर्य था-अस्मिन् पुरुष दुःखमस्ति सुख साधनानुपलब्धे ।। ६४ ।। अर्थ-इस पुरुष में दुःख है क्योंकि इसके पास सुख-साधन की अनुपलब्धि है। यहाँ माध्य दुःख है, दुःख से विरुद्ध सुख है और इसका साधन इष्टसंयोगादि है। इसकी इसके पास उपलब्धि नहीं है। इससे परोक्षभूत दुःस्त्र का सद्भाव इसमें अनुमित हो जाता है ।। ६४॥ साध्यविरुद्धस्वभावानुपलब्धि का उदाहरण : सूत्र--साध्यबिरुद्ध स्वभावानुपलब्धिर्यथा-वस्तुमात्रमनेकान्तात्मकम् एकान्तस्वभावानुपलम्भात् ।। ६५॥ ___ अर्थ–साध्यविरुद्धस्वभावानुपलब्धि का उदाहरण इस प्रकार से है--वस्तु मात्र अनेकान्तात्मक है क्योंकि एकान्त स्वभाव की उसमें अनुपलञ्चि है । यहाँ साध्य अनेकान्तात्मकता है इसमे विरुद्ध एकान्तात्मकता है । इस स्वभाव की यहाँ वस्तुमात्र में उपलब्धि नहीं है अतः अनेकान्तात्मक साध्य की अनुसित हो जाती है ।।६५। साध्यबिरुद्धव्यापकानुपलब्धि का उदाहरण : सूत्र-अस्त्यस्मिन् प्रदेशे छाया उष्णत्वानुपलब्धेः ।। ६६ ।।। अर्थ-इस प्रदेश में छाया है क्योंकि यहाँ पर उष्णता की अनुपलब्धि है। यहाँ साध्य छाया है उससे विरुद्ध आतप है । इसका व्यापक उष्णत्व है । उसकी अनुपलब्धि से छाया साध्य के अस्तित्व का अनुमान किया गया है ।। ६६ ।। साध्यविरुद्ध सहपरानुपलब्धि का उदाहरण : सूत्र-अस्मिन् पुरुष मिथ्याज्ञानमस्ति सम्यग्दर्शनानुपलब्धेः ।। ६७ ।। ध्याख्या साध्य से विरुद्ध के सहचर की जो अनुपलब्धि है वह साध्यविरुद्ध सहचरानुपलब्धि है। जैसे—इस पुरुष में मिथ्याज्ञान है क्योंकि इसमें सम्यग्दर्शन की अनुपलब्धि है । यहाँ पर साध्य मिथ्या
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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