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________________ न्यायरल : न्यायरत्नावली टीका : चतुर्थ अध्याम, सूत्र ३ सूत्र-अविसंवादि वचनत्वात्परमार्थतो वीतराग सर्वज्ञ हितोपदेष्टेवाप्तस्तीर्थकरादि यवहारतस्तु लौकिको जनकादिः ।।३।। संस्कृत टीका-युक्तिशास्त्राविरोधिवचनत्वेनाविसंवादिवचनत्वात् वीतराग-सर्वज्ञहितोपदेशकस्यैव तीर्थकरादेः परमार्थतो ह्याप्तत्वं सिद्ध यति नान्यस्य छद्मस्थस्य, विसंवादिवचनत्वाद् वीतरागत्वस्य सर्वज्ञत्वस्य हितोपदेशकत्वस्य तस्मिनभावात् । केबलं बीतरागस्याप्तत्वे पाषाणादावपि केवलं सर्वज्ञस्याप्तस्खे सिद्धात्मन्यपि, केवल हितोपदेशकस्याप्तत्वे छमस्थस्याप्याप्तत्य प्रसक्तिः स्यादतस्त्रिभिरेभिगुणविशिष्टस्यैवाप्सरखपरमार्थतो भवति इति मन्तव्यम् । तस्यैव यथावस्थित स्वरूपोपदेशकत्वात् । रागद्वेषादयो हि दोषा वचस्य प्रमाणता कारणं भवन्ति न च ते तत्र सन्ति बीतरागत्वात् । वीतरागत्वेनैव तस्मिन् सर्वज्ञता स्यतो टीतरागत्वे सति सर्वज्ञत्वे सति यत्र हितोपदेशकत्वं तत्रैव परमार्थत आप्तत्वं ज्ञातव्यम् । व्यव्हारापेक्षया लौकिक जनकादयोऽपि आप्ताः ॥३॥ सूत्रार्थ-जिनके वचन में पूर्वापर में किसी भी प्रकार का विरोध नहीं पाया जाता है और इसी कारण जो अविसंवादी बन्चन वाले होते हैं ऐसे तीर्थकर अर्हत् परमात्मा आदि परमार्थ से वीतराग सर्वश और हितोपदेशी होने से आप्त कहे गये हैं: व्यवहारदृष्टि से लौकिक जनक आदि सम्बन्धी जन भी आप्त माने गये हैं। हिन्दी व्याख्या-जिनके वचन पूर्वागर विरोध से रहित हैं और इसी से जो अविसंवादी वचन वाले हैं। क्योंकि इनके वचनों में युक्ति और आगम से किसी भी प्रकार का विरोध नहीं आता है, ऐसे तीर्थकर आदि ही परमार्थतः आप्त हैं । आप्त में वीतरागता, सर्वज्ञता और हितोपदेशयाता ये ३ बातें होती हैं, तीर्थकरादिकों में भी ये ३ बातें हैं । अतः परमार्थतः वे ही आप्तकोटि में आते हैं । छद्मस्थजन नहीं क्योंकि उनके वचनों में विसंवाद पाया जाता है और इसी से उनमें वीतरागता, सर्वशता और हितोपदेशकता का अभाव रहता है । प्ररम-आप्तता प्राप्त करने के लिए इन ३ गुणों की आवश्यकता क्यों कही गई है ? उत्तर-जब तक आत्मा में रागद्वेष आदि अन्तरङ्ग प्रबल शत्रु काम करते रहते हैं तब तक वह मलिन बना रहता है और उसके बचन में प्रमाणता नहीं आती है। इसी कारण रागद्वेष से युक्त हुआ मानव यथार्थ वक्ता नहीं हो सकता । अतः आप्तता प्राप्त करने के लिए वीतरागता गुण आवश्यक है। वीतरागता आने पर ही आत्मा में सर्वज्ञता का पूर्ण प्रकाश होता है । इसके प्राप्त किये बिना सूक्ष्मपरमाण आदिकों का, अन्तरित-काल व्यवहित राम रावण आदिकों का और दूरार्थ-देश विप्रकृष्ट सुमेरुपर्वतादिकों का यथार्थरूप से विशद-निर्मल बोध नहीं हो सकता। हितोपदेशकता सर्वज्ञता प्राप्त करने पर ही प्रकट होती है । यथार्थ ज्ञान-केवलज्ञान-हुए, बिमा द्वादशाङ्गरूप आगम का उपदेश अथवा मुक्ति मार्ग का उपदेश नहीं बन सकता इसलिए आप्तता प्राप्त करने के लिये इन गुणों का होना आवश्यक कहा गया है। १. आप्तेनोच्छिन्न दोषण सर्व नागमेशिमा भवितव्यं नियोगेन नान्यथा छाप्तता भवेत् । मोक्षमार्गस्थनेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् मातारं विश्वतरवानां बचे तगुणसन्धये ।।
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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