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________________ न्यायरत्न : न्यायरत्नावली टीका : चतुर्थ अध्याय, सत्र २ ६३ जन्य जो अर्थज्ञान होगा वही आगम प्रमाण होगा, इसके सिवाय और व्यक्तियों के वाक्य से जन्य ज्ञान आगम प्रमाण नहीं होगा। यदि इतने पर कोई निकटस्थ ऐसी आशङ्का करें कि आप्त के वाक्य से जन्य जो ज्ञान होता है, वह आगम है, ऐसा आगम का लक्षण करने पर क्या बाधा आती है ? तो इसके समाधान निमित्त ही अर्थज्ञान आगम है, ऐसा कहा गया है। क्योंकि यदि इस प्रकार का कथन मान्य किया जावे, तो आप्तवचन को सुनने वाले व्यक्ति को उनके सुने गये वचनों से श्रोत्रेन्द्रियजन्य जो सन्यिदहारिक प्रत्यक्ष मतिज्ञान होता है, वह भी आगम ज्ञान की कोटि में आ जावेगा। अतः आप्त के वचन से उत्पन्न हुए अर्थज्ञान को ही आगम कहा गया है। इस प्रकार से यह आगम का लक्षण सर्वथा निर्दोष है, ऐसा जानना चाहिये। प्रश्न- यदि आप्त के वचन से जन्य अर्थज्ञान को ही आगम कहा जावे, तो फिर उनके वचनरूप जो आगम ग्रन्थ हैं, वे आगम नहीं कहे जाने चाहिये । परन्तु उन्हें भी तो आगम कहा गया है""सो किम कारण से ऐसा कहा गया है ? ____उत्तर--ऐसा जो कहा गया है वह उपचार से कहा गया है । "मुख्याभावे सति प्रयोजने निमित्त च उपचारः प्रवर्तते" इस कथन के अनुसार मुख्य के अभाव में किसी प्रयोजनवश या निमित्तवश उपचार की प्रवृत्ति होती है । सो आप्त का वचन रूप आगम यदि विचार किया जाय तो ज्ञान को आगमता के समक्ष अचेतन होने के कारण स्वयं प्रमाणरूप नहीं होता है, परन्तु वह प्रतिपाद्य के ज्ञान के प्रति निमित्त कारण है । अतः प्रतिपाद्य के ज्ञान के कारण होने से "अन्न वै प्राणाः" के अनुसार कारण में कार्य का उपचार कर लिया जाता है । इसलिये आप्त वचन को भी उपचार से आगम प्रमाण माना गया है । यही बात इस निम्नलिखित सूत्र द्वारा स्पष्ट की गई है ॥१॥ सूत्र-तद्वचनमपि ज्ञान हेतुत्वादागमः ।।२।। संस्कृत टीका-यथा स्वार्थानुमान प्रतिपादकव धनमनुमानरूपं निगद्यते तथैवाप्त वचनमपि ज्ञानहेतुत्वादागमरूपं प्रतिपाद्यते युपचारात् । यद्यपि प्रमाणं तु ज्ञानमेव भवति अर्थाज्ञाननिवृत्त्यादि रूप फलस्य तस्मादेव जन्यत्वात् । अज्ञानरूपं वचनादिकं प्रमाणे न भवति प्रमितिरूप क्रियां प्रति तस्यासाधकतमत्वात्, परन्तु "तद्वचनमपि आगमः" इत्यादि व्यवहारकारणमुपचार एव, उपचार प्रवृत्ती च ज्ञान प्रति सहकारित्वमेव निबन्धनम् ॥२॥ सूत्रार्थ-आप्त के वचन भी ज्ञान के हेतु होने से आगम रूप कहे गये हैं। हिन्दी व्याख्या-जिस प्रकार से स्वार्थानुमान के प्रतिपादक बचन अनुमानरूप कहे जाते है. उसी प्रकार से आप्त के वचन भी प्रतिपाद्यजन के ज्ञान के कारणभूत होने से आगम स्प कहे जाते हैं। आप्त के वचनों में जो आगमरूपता का इस प्रकार से कथन किया गया है, वह केवल उपचार से ही किया गया है । यद्यपि प्रमाण ज्ञान को ही माना गया है। क्योंकि अर्थ-पदार्थ विषयक अज्ञान की निवृत्ति रूप साक्षात् फल उससे ही उत्पन्न होता है। वचन प्रमाणरूप इसी कारण नहीं माने गये हैं कि वे अज्ञान जड रुप हैं और इसी से वे प्रमितिक्रिया के प्रति साधकतम नहीं होते हैं. परन्त वे आप्त के वचन तो आगम रूप से कहे जाते हैं उसका कारण प्रतिपाद्य के ज्ञान में उनका कारण होना है। अतः इसी निमित्त को लेकर उपचार से उन्हें आगमप्रमाण रूप से स्वीकार किया गया है ।।२।।
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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