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________________ न्यायरत्न : न्यायरत्नावली टीका : तृतीय अध्याय, सूत्र ६५-६६-६७ [७७ वह इसके पास उपलब्ध नहीं है । इसमे परोक्षभूत दुःख होने का सद्भाव इस प्राणी में अनुमित हो जाता है । यह साध्यविरुद्ध कारणानुपलब्धि का उदाहरण है ॥ ६१ ॥ सूत्र-साध्याविरुद्ध स्वभावानुपलब्धिर्य या-वस्तु मात्रमनेकान्तात्मकम् एकान्तस्वभाषानुपलम्मात् ।। ६५ ।। संस्कृत टीका-अत्र वस्तु मात्र पक्षः अनेकान्तात्मकं साध्यम् । एकान्त स्वभावानुपलम्भः साधनम् वस्तुमात्रस्यानेकान्तात्मकत्वेन एकान्त स्वभावास्यानुपलम्मात् साध्यविरुद्ध स्वभावानुपलब्धिर्भवति । एकान्तस्वभावोऽनेकान्तस्वभावेन साध्येन सह विरुद्धोऽतएव तस्यानुपलब्धितो वस्तुमात्रस्यानेकान्तात्मकता सिद्ध यति । हिन्दी व्याख्या-वस्त मात्र अनेकान्तात्मक है। क्योंकि एकान्तस्वभाव की उपलब्धि उसमें नहीं होती है। यहाँ वस्त मात्र पक्ष है. अनेकासात्मकता साध्य है और एकान्त स्वभाव यह हेतु है । इसमें अनेकान्तात्मकतारूप साध्य से विरुद्ध एकान्तात्मकता स्वभाव को उपलब्धि नहीं होने से अनेकान्तात्मकता साध्य की अनमिति होती है । यही साध्य विरुद्ध स्वभावानपलब्धि है । ६५ ।। सूत्र-साध्यविरुद्ध व्यापकानुपलब्धि यथा--अस्त्पस्मिन प्रवेशे छाया उष्णत्वानुपलम्भात् ॥६६।। संस्कृत टीका-अत्र साध्ये छाया उष्णत्वानुपलम्भादिति हेतु:-एवं च विधिभूतेन साध्येन छायारूपेण सह साक्षाद्विरुद्धस्य तापस्य यद् व्यापकम् उष्णत्वं तस्यानुपलम्भतश्छायाया अनुमितिर्भवति । हिन्दी व्याख्या--साध्यविरुद्ध व्यापकानुपलब्धि का स्वरूप इस प्रकार से है । जैसे---इस प्रदेश में छाया है क्योंकि यहाँ पर उष्णता का अनुपलम्भ है । यहाँ साध्य छाया है, और उष्णत्व का अनुपलम्भ यह हेतु है । यह हेतु साध्यविरुद्ध व्यापकानुपलब्धिरूप है। क्योंकि छायारूप साध्य से तिरुद्ध आतध का व्यापक जो उष्णत्वादिक हैं, उनकी अनुपलब्धि है। अतः उष्णत्वादि की अनुपलब्धि होने से विवक्षित प्रदेश में छाया होने की अनुमिति होती है ।।६६ ।। सूत्र-साध्यविरुद्ध-सहघरानुपलब्धिर्यथा-अस्मिन् पुरुषे मिथ्याज्ञानमस्ति सम्यग्दर्शनानुपलब्धेः ।। ६७ ॥ संस्कृत टीका-अत्र साध्य मिथ्याज्ञानं तेन सह विरुद्ध सम्यग्ज्ञानं तस्य सहचरं सम्यग्दर्शनं तस्य अनुपलब्धिः साध्यविरुद्ध सहवरानुपलब्धिः अनया साध्यस्य मिथ्याज्ञानस्यानुमितिर्जायते । साध्यं द्विविधं भवति विधिरूपं निषेधरूपं च, एवं हेतुरपि द्विविधो भवति–उपलब्धिपोऽनुपलब्धिरूपश्च । तत्र उपलब्धिरूपों हेतुर्यथा-विधिरूपस्य साध्यस्य साधको भवति तथा निषेधस्यापि साध्यस्य साधको भवति एवमनुपलब्धिरूपोऽपि हेतु यथा निषेधरूपस्य साध्यस्य साधको गवति तथा विधिरूपम्यापि साध्यस्य साधको भवति । सर्वमेतत्पूर्वोक्त प्रतिपादन पद्धत्याऽवगतमेतया । हिन्दी व्धानया-साध्य से विरुद्ध के सहचर की जो अनुपलब्धि है । वह साध्य विरुद्ध सहचरानुपलब्धि है । जैसे-इस पुरुष में मियाज्ञान है क्योंकि इसमें सम्यग्दर्शन की अनुपलब्धि है। यहां पर मिथ्याज्ञानरूप साध्य से विरुद्ध सम्यम्झान के सहचर सम्यग्दर्शन को अनुपलब्धि से मिथ्याज्ञान के होने की अनुमिति की गई है।
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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