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________________ न्यायरत्न : न्यायरलावती टीका : तृतीय अध्याय, सूत्र १३ |४६ पक्ष हेतोरभावेन असत्प्रतिपक्षत्वस्य प्रत्यक्षादिना बाधारहितत्त्वात् अबाधितविषयत्वस्य सद्भावन सखे तुत्वापत्तिः स्यात् । तस्मात् विलक्षणत्वं पञ्चलक्षणत्वं हेतौ न सम्भवति। अपितु तथोपपत्तिरूपक निर्दुष्ट लक्षणत्वमेव संभवति । तथोपपत्तेः अन्यथानुपपत्तेर्वा हेतुलक्षणत्वे न कश्चिदर्यभेदोऽस्त्युक्ति वैचित्र्यात् । सूत्रार्थ-तथा-साध्य के होने पर ही उपपत्ति-हेतु का होना यही है एक लक्षण जिसका, ऐसा हेतु होता है। हिन्दी व्याख्या-अग्निमत्त्व रूप साध्य के सभाव में ही धूमवत्त्व रूप हेतु का सद्भाव पाया जाता है। इसी कारण हेतु का लक्षण साध्याविनाभावी ही कहा गया है, जैसा अन्यथानुपपत्ति हेतु का लक्षण कहा गया है। अन्यथानुपपत्ति शब्द से तया तथोपपत्ति शब्द से इसी साध्याविनाभावी हेतु लक्षण का शब्दान्तर से कथन हुआ है। प्रश्न-जैसा आपने तथोपपत्ति शब्द का अर्थ स्पष्ट रूप से समझाया है, इसी प्रकार से अन्यथानुपपत्ति शब्द का अर्थ भी समझाइए तथा इन दोनों में अन्तर क्या है—यह भी बतलाइए ? उत्तर' तथोपपत्ति और अन्यथानुपपति इन दोनो के वाच्याथ में कोई भी अन्तर नहीं है। सिर्फ शब्दों के प्रयोग में ही अन्तर है। अन्यथा शब्द का अर्थ साध्य का अभाव है, और अनुपपत्ति शब्द का अर्थ हेतु का नहीं होना है। इस तरह गाध्य के अभाव में हेतु का नहीं होना यही अन्यथाऽनुपत्ति शब्द का अर्थ है। ___इस तरह का ही लक्षण हेतु का जैन दार्शनिकों ने निर्धारित किया है । क्योंकि इस एक लक्षण के बिना शेष अन्यतीथिक जनों द्वारा मान्य लक्षण सदोष हो जाते हैं हेत्वाभास रूप बन जाते हैं । जहाँ यही एक लक्षण वाला हेतु हो और अन्य पक्षधर्मत्वादि लक्षणों वाला हेतु न हो तब भी वह हेतु अपने साध्य का गमक होता है । इतना इस हेतु का बल है। फिर भी अन्यतीथिक जनों ने इस हेतु लक्षण के प्रति अपना आदर नहीं प्रकट किया है। बौद्ध दार्शनिकों ने साध्याबिनाभावी हेतु का लक्षण न मानकर ऐसा लक्षण माना है, कि जो हेतु पक्षधर्म वाला होता है, सपक्ष में सत्त्व वाला होता है और विपक्ष से व्यावृत्ति वाला होता है-वही हेतु अपने साध्य का गमक होता है। जिम हेतु में ये तीन रूप नहीं होते हैं, वह हेतु अपने साध्य का गमक नहीं होता है। जैसे--यह पर्वत अग्निवाला है क्योंकि धूमवाला है इसलिए, यहाँ धूम म्प जो हेतु है वह साध्याविनाभावी होने के कारण अपने साध्य का गमक नहीं है । प्रत्युत पक्षपर्वतादि में उसकी दत्ति है । सपक्ष-रसोई-घर आदि रूप में उसका अपने साध्य के साथ साहचर्य पाया जाता है और साध्याभाव बाले जल ह्रदादि से उसकी सदा व्यावृत्ति रहती है। इस कारण यह धूमरूप हेतु समीचीन हेतु अपने साध्यरूप अग्नि का गमक बताने वाला होता है । ऐना कथन बौद्धों का है । नैयायिकों का ऐसा कथन है—जिस हेतु में इन तीन रूपों के साथ असत्प्रतिपक्षत्व और अवाधितविषयत्व ये दो रूप रहते हैं. इस तरह जो हेतु पांच रूपों वाला होता है. वही अपने साध्य का अनुमापक होता हैं। इस पर जैन दार्शनिकों का ऐसा कहना है, कि यदि ऐसी ही बात अंगीकार कर साध्याविनाभाबित्व हेतु का लक्षण अनादृत किया जाता है तो फिर जब कोई ऐसा अनुमान प्रयुक्त करता है कि “इस पर्वत में धूम है" क्योंकि इसमें अग्नि है । तब वह अग्निरूप हेतु जो कि अपने माध्यरूप धूम के बिना भी रह जाता है । क्योंकि अंगारावस्था वाली अग्नि के साथ धूम रहता नहीं है-पक्ष में रहता है, सपक्ष में भी रहता है और विपक्ष से भी यह व्यावृत्ति वाला है । अतः इन तीनों रूपों से या पांच रूपों न्याटी०७
SR No.090312
Book TitleNyayaratna Sar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherGhasilalji Maharaj Sahitya Prakashan Samiti Indore
Publication Year
Total Pages298
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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