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________________ निमितशास्त्रम [८१ । रोहिणि सुशुपत्ती देएसविणशि संदेहो|१६|| अर्थ : कृतिकानक्षत्र में यदि वर्षा होवे तो अनाज की हानि होती है। यदि रोहिणीनक्षत्र में वर्षा होती है तो देश की हानि होती है। जइमयसिरम्मिवरसइतत्थ सुभिक्खं तिहोइणायव्वो। अदाए चित्तलवो पुणव्वसेमास वरिसंति॥१६८|| अर्थ : मृगशिर नक्षत्र में पानी बरसने घर अवश्य सुभिक्षा होगा । यदि आर्द्रा नक्षत्र में वर्षा होवे तो खण्डवृष्टि होगी । यदि पुनर्वसु नक्षत्र में पानी गिरे तो एक माह तक वर्षा होगी । पुस्से वाउम्मासं सस्साणयउच्छहोइसंपत्ति। असलेसेबहुउदयं सस्साण विणासणंहोई॥१६९॥ अर्थ : यदि पुष्य नक्षत्र में पानी बरसे तो श्रेष्ठ वर्षा होगी और अनाज अच्छा होगा। यदि आश्लेषा नक्षत्र में पानी बरसे तो अनाज की हानि होगी। __ मह फागुणी हिवरसइखेम सुभिक्खं हवेइणायव्वं। है उत्तरफागुणि हत्थेखेम सुभिक्खं वियाणाहि॥१७०|| अर्थ : यदि मघा व पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में पानी बरसे तो कुशल और सुभिक्ष होता है। यदि उत्तराफाल्गुनी और हस्त नक्षत्र में पानी बरसे तो में भी यही फल जानना चाहिये। ___चित्ता हिमंदवरिसं साइहिमिह वइवादि परिखेऊ। बहुवरिसंचविसाहाअणुहाहेणाविबहुवरिसं॥१७१||
SR No.090300
Book TitleDavvnimittam
Original Sutra AuthorRushiputra Maharaj
AuthorSuvidhisagar Maharaj
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2003
Total Pages133
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size3 MB
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