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________________ णमोकार ग्रंप प्रामा वा पक्वा वा खादति यः स्पृशति वापिशिनपेशी। म निहन्ति सतत, निचितं पिडं बहुजीय कोटीनां । पर्थात् जो जीव कच्ची या पकी हुई मांस पेशो को अपना मांस पुष्ट करने लिए खाता है। पथवा मांस खाने के संकल्प से स्पर्श करता है वह पुरुष निरंतर इकट्ठे हुए प्रनंत साधारण जीवों के समूह को नष्ट करता है। जब अपने प्रयत्न के विना अन्य के मारे हुए अथवा स्वयं मरे हुए जीव का मांस स्पर्श करने अथवा भक्षण करने से हिंसक होता है तो प्रयत्न पूर्वक प्राणियों का घात कर उसे जो खाता है उस ऋर कर्म करने वाले हिंसक का क्या कहना है ? वह तो महाहिसक है हो । मांस भक्षियों के परिणाम सदा नियम करके घातक रहते हैं । उनके परिणामों में दया तो गन्ध मात्र भी नहीं होती। जैसा कि कहा गया है कि महाशक्तस्य नो विद्या, नो क्या मांसभोजिनः । इपलुष्पस्य नो सत्यं, स्त्रीणुस्य न पवित्रता॥ पर्थ-जिसकी घर में प्रासक्ति है, उससे विद्या अध्ययन नहीं होता, मांसभक्षी के हृदय में दया नहीं होती, जो द्रश्य का संचय करने में तीव्र लोभी है, वह सत्य वक्ता नहीं होता और जो स्त्रियों के सुखभोग में पासक्त होता है, वह पवित्र नहीं माना जाता । दया के अतिरिक्त और भी उत्तम गुण प्रायः मांसभक्षी पुरुषों में से गमनकर जाते हैं । जैसा कहा भो है यतो मसाशिषः पुसो, दमो वानं यानंता । सत्यशोचवताचारा, न स्युविद्यावयोऽपि च ॥१॥ अर्थ---मांसभक्षण करनेवाले लोगों के इंद्रिय दमन, दान, दया, सत्य, पवित्रता, व्रत, प्राचार, विद्या हिताहित का विचार प्रादि समस्त गुण नष्ट हो जाते हैं। इसका खाना भी सामाजिक एवं धर्म पति में निंद्य मिना जाता है । सब लोग उससे वार्तालाप तक करने में घृणा करते हैं। यह दोष परलोक में भी नरक में ले जाने का कारण है अतएव बुद्धिमानों को मांस भक्षण के परिहार पूर्वक महिसा धर्म का धारण करना श्रेय है । देखो ! इसी मांस भक्षण के बारने से बकु नाम के राजकुमार ने राज्य के प्रधः पतन को प्राप्त कर भीषण कष्ट उठाये मोर अंत में नरक निवास किया। उसके उपख्यानों से मनुष्य को इस विषय में बहुत शिक्षा मिलेगी, प्रतएव पूर्वोक्त प्राचार्यों के कथनानुसार यहां संक्षिप्त विवरण लिखा जाता है इस जंबुद्वीप में भरत क्षेत्र के मध्य मनोहर नाम के देश के अन्तर्गत कुशाग्रह नाम का एक प्रसिद्धमौर मनोहर नगर था। उसमें भूपाल नाम का राजा विदुषी महारानी लक्ष्मी सहित राज्य करता पा। सर्वगुण विभूषित महारानी लक्ष्मी और राजा जिन भगवान के परम भक्त थे, परन्तु उनका पुत्र घकु अशुभोदय से मांस भक्षण करने में बड़ा लोलुपी था। जब प्रतिवर्ष अष्टाह्निका पवं पाता तब महाराज अपने सारे नगर में बड़ा महोत्सव करवाते और यह घोषणा करा देते कि मेरे नगर में कोई मनुष्य जीवधात न करे । यदि कोई करेगा तो उसे राजद्रोही समझ कर दण्ड दिया जायगा। यह सुनकर नगर निवासी मनुष्यों ने राजाज्ञा के अनुसार सर्वथा हिंसा करना छोड़ दिया, मांसलोलुपी बकु को बड़ी चिन्ता हुई । वह विचारने लगा कि मुझे मांस भक्षण करने की आदत पड़ गई है। मैं बिना मांस के कैसे रह सकूगा? अब क्या करूं? ऐसी चिंता करता हुमा अपने रसोइये के पास जाकर कहने लगा-हे मित्र ! मेरे भोजन के निमित्त मांस तैयार करो।'
SR No.090292
Book TitleNamokar Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDeshbhushan Aacharya
PublisherGajendra Publication Delhi
Publication Year
Total Pages427
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size14 MB
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