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________________ भूलाराधना आश्वासः शानप्रकाशमाहात्म्यं कथयति जाणुज्जोवो जोवो णाणुज्जोवस्स णस्थि पडिघादो ॥ दीवेइ खेत्तमप्पं सूरो णाणं जगमसेसं ॥ ७६८ ॥ ज्ञानोयोतो महोचोतो व्याघातो नास्य विद्यते ।। क्षेत्रं द्योतयते सूर्यः स्वल्पं सर्वमसौ पुनः ।। ७९८ ॥ विजयोदया - णाणुज्जोवो शानोद्योत पत्र द्योतोऽतिशयितः । कस्तस्यातिशय इत्यत आइ--णाणुज्जोरस्स गस्थि पडिवादो ज्ञानोद्यतस्य नास्ति प्रतिघानः । वीवेदि प्रकाशयति । खत्तमपं स्वल्पं क्षेत्र कः? सूरो आदित्यः । णाणं जगमसेस शानं जगदशेष । दीवेदि प्रकाशयति । समस्तव्याज्ञिानप्रदन्यः प्रकाशो नास्तीत्यर्थः ॥ ज्ञानप्रकाशका महत्व आचार्य कहते हैं अर्थ-ज्ञानरूपी जो प्रकाश है वही उत्कृष्ट प्रकाश है. इसमें यह विशेषता है कि यह किसीके द्वारा नष्ट कर नहीं सकते हैं. हवा वगैरह पदार्थ दीपकका नाश करते हैं परंतु ज्ञानदीपका नाश करनेवाला जगमें कोइ भी पदार्थ नहीं है. सूर्यका प्रकाश बहुत तीव्र है परंतु यह भी अल्पक्षेत्रको ही प्रकाशित करता है. परंतु यह शानप्रदीप समस्त जगतको प्रकाशित करता है. समस्तको व्यापकर जाननेवाले ज्ञानके समान दूसरा प्रकाश जगमें नहीं है, णाणं पयासओ सो वओ तवो संजमो य गुत्तियरो ॥ तिण्हपि सभाओगे मोक्खो जिणसासणे दिलो ॥ ७६९ ॥ शानं प्रकाशक वृत्तं गोपर्क साधकं तपः ॥ प्रपाणां कथिता योगे मितिर्जिनशासने ॥ ७९९ ।। विजयोदया-णाणं पगासग ज्ञान प्रकाशयति । संसार संसारकारण, मुक्ति मुक्तिकारण च ॥ सो वो तबो निर्जरानिमित्तं तपः । संजमो य गुत्तियरो संयमश्च गुप्तिकरः । तिण्इपि त्रयाणामपि समायोगे सयोगे मोक्यो मोक्षः। जिणसासणे विटो। जिनशासने दृष्टः । अर्थ-ज्ञान संसार और मुक्तिके कारणोंको प्रकाशित करता है. बत, निर्जराके कारणरूप तप, गुप्तिको ९२८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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