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________________ आधार मूलाराधना २११ घिजयोव्या-तर्सि याराघणणायगाणं अईदादीनां आराधनाया नायकानां । ण करिज्ज जो पारो भात यो नरो भारी न करोति । स धाति पि संजमतो नितरी संयमे उद्यतोऽपि शालीनूपरे देशे चपति । ऊपरे शालिवपनं अफलं यथा फरोत्येवं दुश्वरं संयमं चरत्ययं अईदाविषु भाक्तिरहितो मिथ्यापि समिति भावः ॥ अर्थ-- सम्यग्दर्शनादि चार आराधनाओं के नायक ऐसे अईदादिपरमेडिओंमें जो पुरुष भक्ति नहीं करता है. वह चारित्रमें खुप तत्पर रहनेपर भी क्षार मृत्तिकाम शालिबीज बोनेवाले मनुष्य के समान है. जैसे शालिबीज क्षारजमीनमें बोनसे कुछ फायदा नहीं है वैसे मिथ्यादानसहित होकर खुच नपश्चरण करनेसे मी मुक्तिफल की प्राप्ति होनी नहीं. बीएण विणा सस्सं इच्छदि सो बासमभएण विणा ॥ आराधणमिच्छन्तो आराधणभत्तिभकरंतो ।। ७५० ॥ ते बर्जिन विना सस्यं वारिदेन बिना जलम् । कांक्षन्ति ये विना मक्ति कांक्षात्याराथनां नराः ॥ ७७१॥ वियोन्या- बीजेगा धिणा सम्लं शस्यमिति नीजन विना । शसमम्भारण चिणा वृष्टि अनष विता। कारणेन विना कार्यमिकस्तांति यायन् | आराधनां रत्नत्ररमिक इच्छति । अकुर्वनाराधनाभक्ति तुभून अर्थ-आराधनारूप भक्तिम करके ही जा रत्नत्रयसिद्विरूप फल चाहता हे यह पुरुष बीजके विना । धान्यप्राप्तिकी इच्छा रखता है. अथवा मेघ के विनाही जलवृष्टि की इच्छा करता है ऐसा समझना चाहिए. विधिणा कदस्त सस्सरस जहा णिप्पादयं हबदि वासं ॥ तह अरहादिगभत्ती णाणचरणदंसणतदाणं ॥ ७५१ ॥ विधिनोप्तस्य सस्यस्य वृष्टिनिष्पादिका यथा ।। तथैवाराधनाभक्तिश्चतुरंगस्य जायते ।। ७८० ।। विजयोदया-विधिणा कदस्स विधीयते जन्यते कार्यमनेनेति कारणसंदोहो विधिः । तेन कारणकलापन कृत 'स्योसस्य । सरसस्स शत्यस्य । वासं जहणिपादयं यदि वर्ष यथा फलनिष्पास करोति । तह तथैव । भाराहगभत्ती
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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