SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 900
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मूलाराधना देख नहीं पाता परंतु विवेकसे वह रहित नहीं है. परन्तु विषयांध हेय, उपादेय, कुछ भी जानता नहीं. इस प्रकार का उपदेश करके उसकी आहारकी अभिलाषा हृदयसे निकालते हैं. सोच्चा सल्लमणत्थं जहरदि अमेममापमाण ॥ वेरग्गमणुप्पत्तो संवेगपरायणो खवओ ।। ३९७ ॥ काश्रिवुद्धरते शल्य क्षिप्रमाकर्ण्य देशनाम् ।। करोति संभनित्रस्तः सूरीणां वचसा न किम । '७२५।। विजयोदया-सोया थत्वा नराम्राथा । सशस्य, उद्धरदि उत्पादयति । असेस अशष । पनादेण प्रमाई चिना । वरन्गमयुपतो गन्धमनुप्रातः । संवगपरायणः संवगपरः । क्षपकः शल्योद्धरणपरो भवति ॥ गुरूपदेशमाकर्ण्य झटिति प्रतिबुद्धः स क्षपको यद्विधत्ते सदभिधत्तेमूलारा--स्पष्टम् । अर्थ--इस प्रकार वैराग्य बढानेवाला उपदेश सुनकर क्षपक प्रमाद छोड़ देता है. और संपूर्ण अभिलाषा रूपी शल्यको हृदयसे निकालकर फेक देता है. वैराग्य युक्त होकर संसारसे भययुक्त होता है, अणुसजमाणए पुण समाधिकामरस सव्वमुबहरिय ।। एकेकं हावेतो ठवेदि पोराणमाहारे ॥ ६९८ ॥ समाधानीयतो गृधनोः संत्याज्य सकल गणी ।। एक हापयन्मेवं प्रकृते वधते शनैः॥ ७२६ ।। विजयोदया--अगुसजमाणप. पुण कृतेऽप्याहाराभिलाषस्य बोषोपदर्शने | अणुसज्जमाणमे आवारे अनुरागव तिक्षपके । समाधिकामस्स समाधिमरणमिच्छतः । सम्वमुवाहरिय सर्वमाहारमुपसंमृत्य । कथं एक हावेतो एक आहारं हापयन् सूरिः। उपेदि स्थापयति । शपर्क । पोराणमाहारे प्राक्तने आहारे ।। तदनुधिनं समाधिमरणार्थिनं एकैकहापनेन सर्व गृद्धिकरमाहारं साजयित्वा मूरिः आपकं प्रकृताहारे स्थापयतीनि उपदिशति-- APATES .. . .. ..
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy