SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 892
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मूलाराधना सहबदीणं पास अल्लियदु असंवुडाण दाव्वं ॥ तेर्सि असंवुडगिराहिं होज खवयस्स असमाधी ॥ ६८५।। तस्यासंघृतवाक्यानां न पायें देयमासतुं ॥ वचनैरसमाधानं तदीयैर्जायते यतः ॥ ७११॥ घिजयोदया- असंधुदाण पास सहवदीण अल्लियत् ण पादचं असंतान क्षपकसमीपं द्वौकनं न दातव्य । याघदेशस्थानां तो बचन न यत । कस्मादसंवृतजमसमीपागमन निविष्यंत इत्याच-नेसि असंबडगिरादि होज्ज व्ययम्स असमाधी । तेशममवृताभिर्वाग्मिवेक्षपकस्य असमाभिः । क्षीणो हि जनो पिचिकतलया कुष्यति संकुशमुपयाति या। उत्तमाथेसायकस्व गमीप वाचालानां गमनं निषेदुमाइ-. मूलारा-सवदी शब्मपतीनां शतिनां च कलकरकारिणामित्यर्थः । पास समीपं अर्थात्क्षपकस्य । अल्लिइदु आश्रयितुं । असंखुडाप वाग्गुमिसमिति विकलानां । असंबुडगिराहिं उत्सूत्राभिर्वाग्भिः । असमाधी चित्तविक्षेपः । श्रीगो हि जनो यत्किंच्छित्वा कुप्यति सजिलश्क्ते वा। अर्थ-जो वाग्गुप्ति अथवा भाषासमितीके पालक नहीं है. जो आगमसे विरुद्ध भाषण बोलत हैं अथवा जो जादा कलकल करते हैं ऐसे लोकोंको क्षपकके पाप्त नहीं जाने देना चाहिये. क्यों कि उनका निरर्गल आगम विरुद्ध भाषण सुनकर क्षपकका चिच रत्नत्रयमें स्थिर न होगा और क्षीण हुआ वह क्षपक कोपयुक्त संक्लंश परि. पणामयुक्त हो जावेगा अतः आगमविरुद्ध जादा याद करनेवालं को क्षपकके पास जादा निषिद्ध किया है. जहां तक शब्द सुनने में आवेगा वहाँ तक उनका गमन निषिद्ध समझना चाहिये. भत्तादीण भत्ती गीदत्थेहिं वि ण तत्थ कादवा ।। आलोयणा बि हु पसस्थमेव कादविया तत्थ ॥ ६८६ ॥ गीताधैरपि ना कृत्या स्त्रीसक्ता दिका कथा । आलोचनादिकं कार्य तत्रातिमधुराक्षरम् ।। ७१२ ॥ -
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy