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मूलाराधना
आशमः
अर्थ-इस प्रकार ये माहात्म्यवान असतालीत भुमि उत्कृष्ट प्रयनेस क्षपककी समाधेि में एकाग्र करते है. और संसारसमुद्रसे प्रयाण करनेवाले उस क्षपकको समाधिक कायमें अर्थात् रत्नत्रयमें प्रयुक्त करते हैं,
व्याणितगुणा पव निर्यापका इति न राय, किंतु भालेरावतयोपिवित्रकालस्य परावृतः कालानुसारंगद प्राणिनी गणाः मवनंते तेन यदा यथाभूताः शोभनगुणाः संभवंति तदा तथाभूता यतयो निर्यापकत्वेन ग्राहा इति वायति -
जो जारिसओ कालो भरदेग्यदेसु होइ चासेसु ॥ से तारिसया तदिया चोहालीस पि णिज्जवया ॥६७१ ॥ कालानुसारतो ग्राण्याश्चत्वारिंशचतुर्युलाः ॥
भरतरावतक्षेत्रभाचिनो मुनिपुंगवाः ॥ २६ ॥ विजयादया- जो जारिसओ कालो इत्यादिना यो मादक डान्दो ! बरंदाबंदर वाससु भरत रावतपु जनपदषु । पंचभरलाः पंचगवतास्त निर्यापकास्तारिसगा नाहाभूताः कालानुगुणा इति यावत् । तदया तस्मिन्काल ग्राह्या इत्यर्थः ।
सर्वत्र सर्वदा यथोक्तगुणगणना एष लियोपकाः स्युरिति न प्राय । कालानुसारेण प्राणिनां गुणप्रकृतेः भरतैरात्रतक्षेत्रेषु विचित्रकालपरावृत्तिरतम्तत्र यदा यथाभूता यावंतश्च स्फुरद्रुणा पतयः संभवंति तदा तथाभूतास्तावतश्चेति निर्यापकत्वेन व्यवस्थाप्या इति दर्शयितुमाइ ---
मलारा-भरदेरवदेसु पंचसु भरतेषु पंचसु ऐरावतेपु । वासेसु क्षेत्रेषु । तइया तदा तस्मिन्काले कालानुगुणा निर्यापका ग्रामा इत्यर्थः।।
जिनका गुणवर्णन ऊपर किया है ऐसे ही सुनि निर्यापक होते हैं ऐसा न समझना चाहिये. परंतु भरत और ऐरावत कालमें विचित्र कालका परावर्तन हुआ करता है इसलिये कालानुसार प्राणिक्के गुणोंमें भी जघन्यमध्यमता और उत्कृष्टता आती है. जिससमय जैसे शोभन गुणोंका संभव रहता है उस समय बसे गुणधारक मनि नियापक परिचारक समझ कर ग्रहण करना चाहिये.
__ अर्थ - भरतक्षेत्रमें और एरावतक्षेत्रमें समस्तदेशामें जो जैसा काल प्रवर्तता है उसके अनुसार निर्यापक समझना चाहिये. अर्थात् मध्यमकालके प्रारंभमें चव्वेचालीस निर्यापक होते हैं,