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________________ ना श्रावास - ७२० विजयोदया- पक्षियचा उम्मामिय पक्षायतिचा शुदिकालषु । न नामहारदा पटुजनदायसंकंटे । धिच्छाणास काथमि यंधळ्या दोघानात्माियान्कथयति ।। सहानुलगगिति सामं आलोचनादो गाथात्रयगाह-- मूलारा--जहिच्छाए यथेच्छा । अर्थ--- पाक्षिक दोषोंकी आलोचना, चार्मासिक दोषोंकी आलोचना और वार्षिक दोपोंकी आलोचना सब यतिसमुदाय मिलकर जब पास है। अपने दोस्च्छासे कहना यह बहुजननामका दोप है. इय अव्वत्तं जइ सावतो दोसे कहेइ सगुरूणे ॥ आलोचणाए दोसो सत्तमओ सो गुरुमयाने ॥ ५९१ ।। अव्यक्तं वदतः स्वस्य दोघान्सक्लिष्टचतसः ।। आलोचनागती दोषः सप्तमः कथिता जिनः ॥ ६१६ । विजयोदया-जदि इय अञ्चनं सावेतो दोसे कहेइ सगुरूर्ण यद्यवमध्यक्तं धायगन्दोषान्कथयति स्वगुरुभ्यः । सतमगो आलोयणादोसो । सप्तम आलोचनादोषः गुरुसयासे गुरुसमीपे प्रवृत्ती भवति । मूलारा-सावेतो भावयन । अर्थ यदि अम्पष्ट नीम गुरुको मुनागा द्या अपने दोग नि कहगा तो गुरुके चरणसन्निध उसने मातवा. शब्दारलित दोष किया हैसा समझना. अरहघडीसग्मिी अहवा चुनछद्रोचमा होई॥ भिघटसरिछा वा इमा ह सामानाचा ।। ५१.२ ।। अरगर्तनणियसमा भिन्नघटापमा ।।। चुदरज्जुनिभामेनां शुद्धिं शुद्धिविदो विदुः ।। ६१७ ।। इति शब्दाकुलो दोषः ।।
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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