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________________ आश्वासः 4641 मनागमनाम रिजयोदया - धादो वेन्ज अपणो गुप्ता नवेदन्यः । जदि अण्णामि जिमिम्मि संतस्मि । यवन्यस्मिन्भुक्तवति सति । तो ततः । परबबदेसकदा सोधी परव्यपदेशकृता शुद्धिः । अण्ण विसोधेज्ज अन्य विशोधयेत् ।। छन्नदोगदुष्टालोचनाया नैष्फल्यं दृष्टांतन स्फुटयतिमूलारा-धादो तृप्तः । जिमिदम्मि मुक्तवति । संतम्मि सति | परवरदेसकदा अन्यमुरिश्यकृता । अर्थ-उपयुक्त दोषका दृष्टांत इस प्रकार है - यदि किसी अन्य मनुष्यके भोजन करनेपर उससे अन्य मनुष्यका पेट भरेगा तो दुसरेके नामसे किया हुआ प्रायश्चित्त दूसरेको विशुद्ध करेगा ऐसा मानना पढगा. कष्टात्तम गाथा - तवसंजमम्मि अण्णण कदे जदि सुग्गदि लहदि अण्णो । तो परववदसकदा सोधी सोधिज्ज अण्णपि ।। ५८८ ॥ संयम चन्कृतगन विमुक्ति लमते परः ।। परण्याजकता शुद्धिस्तदा शोधयते परम् ।। ६१३ ॥ तदेव हदयति - मूलारा-सुग्गदि सद्गतिम् ॥ अर्थ-तप और संयम भी अन्य व्यक्तीने किये जानेपर यदि अन्यही व्यक्तीको सुगतिकी प्रत होगा तो इसा के नाम किया हुआ प्रायश्चि भी दुसरको दोषसे मुक्त करेगा ऐसा मानना पड़गा. Ur.AmitteutAARATRAPAN मयतण्हादो उदयं इच्छइ चंदपरिवेसणा कूरं ।। जो सो इच्छइ सोधी अकहंतो अप्पणो दोसे ।।.५८९ ।।, .. गुरोनिजं दोषमभाषमाणो दोषस्य यः कांक्षति शुद्धिमज्ञः ॥ मन्ये स तोयं मृगतष्णिकातो जिघृक्षतेनं शशिषिबतो वा।। ६१४॥ इति छन्नं दूषणम् ॥ ७९२
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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