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________________ मनाराफ्ना आबासा विजयोदया- को तस्स विज्जा तवो किं तस्मै दीयते तपः ? । ऋण दवारण द्वादि वा मुद्धो केनोपायेन वा शुहो भवतीति । पच्छपणे प्रच्छन्नं । पुन्छदि पृच्छति । आत्मानमुद्दिश्य मयायमएमयः कृतस्तस्य किं प्रायश्चित्तं रति न पृच्छति । किमर्थमेवं प्रगछन तृरुति । शाश्या पायश्चित्ते करिस्पति करिया अर्थ --उसको कोनसा तप दिया जाता है, अथवा किस उपायम उसकी शुद्धि होती है एसा प्रच्छन रूपसे पूछता है. अर्थात् मैन ऐसा २ अपराध किया है और उसका क्या प्रायश्चित हैं ? ऐसा न पछका प्रन्छन पूछता है. प्रच्छन्न पूछकर तदनंतर मैं उस प्रायश्चित्तका आचरण करूंगा ऐसा हेतु उसके मन में रहता है. - इय पच्छण्णं पुच्छिय साधू जो कुणइ अप्पणो सुद्धिं ॥ तो सो जिणेहिं बुत्तो छटो आलोयणा दोसो ॥ ५८६ ।। इत्यन्यव्याजतश्छन्नं पृच्छयते चेत्स्वाद्धये ॥ तदानीं जायते दोषः षष्ठः संसारबर्द्धकः ।। ६१० ॥ विजयोदया- हय पर्ष । पच्छषां पुच्म्यि पृष्ट्वा । जो सामाधुः । अषणों सोधि कुगादि आन्मनः शुणिं करोति । सो छटो आलोयणा दोसो वुत्तो जिहि । षष्ठोऽसावालो बनादापातम्प भवतीति जिनका।। अर्थ--ऐसा गुप्त रीतीस पूछकर जो साधु अपनी शुद्धि कर लता है. वह आलोचनाका हा दोप है । ऐसा जिनेश्वरने कहा है. --- e धादो हवेज्ज अण्णो जदि अग्णम्मि जिमिदम्मि संतम्मि ॥ तो परववदेसकदा सोधी अणं विसोधिज।। ५८७ ।। भोजने च कृतेऽन्येन तृप्तिरन्यम्य जायते ॥ अपरस्य तदा शुद्धिर्विहिना परभर्मणा ।। ६११ ।। आत्मशुद्धिं विधत्तं यः प्रपृच्छय परभर्मणा ।। अपरेणाषधे पीते स्वस्यारोग्यं करोति सः ।। ६१२॥ %
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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