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________________ मृगाराधना आधामः ७८२ विजयोदया-आलोचमि य सब्जे सर्वतिचारजातं आलोचयामि । दि पच्छा अगुग्गह. ऋणह मर यदि पश्चादनुपःकियने भयादि । तुम सिरीघ । भवता थिया । इच्छं इच्छामि । सोयी सुदि हिनामि निम्नाय. प्याम्यात्मानं ॥ मूलारा--पच्छा आलोचनानंतरं । अगुग्गई कृपा । तुम्हाभरी भपता प्रसा। इन्हें इच्छागि । सोधीय शुद्धि । णिच्छरेज्जामि निस्तारयाम्यात्मानं । अन्यस्तु णिच्छरेज्जामि निस्तारितुमिच्छामीत्याह || अर्थ--यदि मेरे ऊपर आप अनुग्रह करेंगे अर्थात मेरेको आप यदि थोडासा प्रायश्चित्त देंगे तो मैं अपने संपूर्ण अतिचारोंका कथन करूंगा और अपनी कृपासे मैं शुद्धियुक्त होकर अपराधाम मुक्त होउंगा. HAPP Animal अणुमाणदृण गुरुं एवं आलोचणं तदो पच्छा ॥ कुणइ ससल्लो सो से विदिओ आलोया योनी || '१७२ ॥ कुर्वाणस्वानुमान्यति सूरिमालोचनां यतेः ।। 'भवत्यालोचनादोषो द्वितीयः शल्यगोपकः ।। ५९७ ।। विजयोदया-पवं अनाणेदन पर्व अनुमानेन ज्ञात्वा । गुरुः प्रार्थिः करिम्पति स्वल्पप्रायश्चित्तानन ममा. नई इति । पच्छा शालोयण कुणा पश्चादालोचना करोति । ससशस्यसहितं । सो सः । स तस्य । चिदियो द्वितीय बालोयणावोसो आलोचनायोरः । भूलारा-- अणुमादूण अनुमानव शान्वा । अर्थ---- गुरु मेरको थाडासा प्रायश्चित्त देकर मेरे ऊपर अनुग्रह करेग मा अनुमान करके मायाभावम जो मुनि पश्चात् आलोचना करता है. यह अनुमानित नामक आलोचनाका दूसरा दाप है. गुणकारिओत्ति भुंजइ जहा सुहत्थी अपच्छमाहारं ।। पन्छा विधायकडुगं तधिमा सल्लद्धरणसोधी ॥ ५७३ ॥ SATTA
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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