________________
मनाराधना
आभासः
बदापन और छोटापन उत्पन्न होता है. और उसके अनुसार ही छोटा अथवा बडा प्रायश्चित दिया जाता है. अथवा परिणामों में तीव्रता वा मंदता होगी तो उसके अनुसार छोटा या बटा प्रायश्चित्त आचार्य देते हैं. शिक्षयत्यालोचनाक्रम सूरि:
आलोयणा हु दुविहा ओघेण य होदि पदविभागीय ॥ ओघेण मूलपत्सम्स पयविभागी य इदररस ॥ ५३३ ॥ आलोचना द्विधा साधोरौधी पदविभागिका ।।
मथमा मृलयातस्य परस्य गदिता परा ।। ५५३ ।। विजयोदया-आलोयणा खुदुविदा होदि द्विप्रकारवालोचना भवति । ओयेण पदविभागीय सामान्येन विशेषेपा ची पचो हि सामान्य विशेष चावलान्य प्रवर्तते । कस्य सामान्येन आलोचना कस्य वा विशेषेणेत्यत पाहओघेण मूलपत्तस्स सामान्पालोचना मूलाग्यं प्रायश्चित्तं प्राप्तस्थ । पबिभागी विशेषालोचना । दरस्स मूलमप्राप्तस्य ।
वसा सामान्यविशेषालंबनत्वेन प्रवृत्तिदर्शनादोषी पादायभागी चेति द्विविधवालोचनेति नियम्य तत्स्वामिनी सिदिशाते।
मूलारा-ओघेण सामान्येन एकचारेण या सामान्य लोचनेत्यर्थः । पादाभागी पादानां सम्यक्त्वाद्यपराधाचा विभागे देशकालादिभेदे भया पादविभागी विशेषालोचनेत्यर्थः । मूलं मूलाख्यं प्रायश्चित्तं ॥
आचार्य आलोचनाका क्रम दिखाते हैं---
अर्थ--आलोचनाके दोही प्रकार हैं, एक ओघालोचना और दूसरी पदविभागी आलोचना. अथात सामान्यालोचना और विशपालोचना ऐसे इनके औरभी दो नाम है. वनन सामान्य और विशेष इन दो धर्माका आश्रय लेकर प्रवृत्त होता है, अतः आलोचनाके उपयुक्त दो भेद हैं,
सामान्यालोचना और विशेषालो वनाका स्वरूप इस प्रकार है-जो मूल नामक प्रायश्चित्तकेलिय योग्य है अधात जिसकी पूर्व दीक्षा महापराधसे नष्ट हो गई है उसको पुनः दीक्षा देना यह मूल प्रायश्चिनका अर्थ है. इस प्रायश्चित्तके लिये योग्य मुनि दाषाकी सामान्यालोचना करता है. और जो प्रायश्चित्तको छोड कर के बाकीफे प्रायश्चित्तके योग्य है वह पदविभागी आलोचना करे.