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________________ मूलाराधना आश्वासः इंद्रियजयं कषायजयं च कुर्षिस्युपदिशति सद्दे रूवे गंधे रसे य फासे य णिज्जिणाहि तुमं ।। सवे कसाएसु य णिम्गहपरमा सदा होह ॥ ५२३ ॥ रूपगंधरसस्पर्शशब्दानां मा स्म पूर्वशः॥ कषायाणां विधेहि त्वं शत्रूणामिव निग्रहम् ।। ५४३ ॥ विजयोदया--सदे रूवे गंधे इत्यम्या । ननु शम्वादको विषयास्तेषां जयो नाम कः? तषियो हिरागो चंधहेतुत्वात् नरप्रतिपक्षभाषनया जेतव्यत्येनोपदेशव्यः । अयोग्यते-सोपस्कारत्यारसूत्राणां सद्दे, ब्वे, गधे, रसे य फासे य राग नुमं जिणादि इति पदसंबंधः। अथवा शब्दावीनां विषयाणां यशन स्थित इति कृत्वा जेता भण्यते यथा पुरुषो जितो उनयेत्युच्यते या पुरुपयशानुयतिनी न भवति । सच्चेसु कसापसु य सर्वेषु कमायेषु वा क्रोधादिषु। णिग्णहपरमो निग्रहः प्रधानः क्षमादिभावनया सदा भव॥ इंद्रियजय कपायनिग्रहं च फुर्वित्युपदिशति-- मूलारा--णिज्जिगाहिं नि:शेषेण जय त्वं शब्दादिविषय रागमिति शेषः । अथवा शब्दादीन्विषयाभिजय तशो मा भूरित्यर्थः । विगहपरमो निग्रहप्रधानः || इन्द्रियोंको और कषायों को तुम जीतो ऐसा उपदेश - अर्थ--शद्ध, रस,गंध, और स्पर्श ये पांच इंद्रियोंके विषय हैं उनको कैसा जीत सकते हैं ! शब्दादिकोंमें उत्पन्न होनेवाले रागभावको जीतना चाहिये क्योंकि यह कर्मबंधका कारण है. रागभावको उसके विरुद्ध भावनासे जीतना चाहिये ऐसा यहाँ उपदेश करना योग्य था परंतु आचार्य शब्दादिकोंको जीतने के लिये क्षपकको उपदेश दे रहे हैं यह योग्य जचना नहीं... उत्तर--सूत्र सोपस्कार रहते हैं. अर्थात् उसमें प्रकरणवश और कुछ शब्द जोडकर संबंध ठीक मिलाना पड़ता है. 'सद्दे रूवे गंधे रसे य फास य रागं तुम जिणाहि, एसा पद संबंध करना चाहिय. अर्थात यहां ऐसा अर्थ समझना चाहिये-हे क्षपक तुम शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श ऐसा पंचेंद्रियांक विषयों में जो गगभाव उत्पन्न होता है उसको. जीतकर संपूर्ण क्रोधादिक कषायोंका क्षमा, मार्दव, आजब, और शौचभावनासे निग्रह करो. - - ७१२
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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