SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 744
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मूलाधना आश्वासा ७२४ मूलारा-सवणकर्स श्रुतिसुखं । देदि कथयति । कथं कयां । सदीसमण्णाहरणहेदु स्मृतिसमत्याहरणा हेतु स्मृतेः पूर्वाभ्यस्तगीतार्थगोचरस्य स्मरणस्य मतेर्वा समानयनकारणम् ॥ ... अर्थ-आचार्य बहुत प्रिय वचन होनेसे स्निग्ध, कठोराक्षर न होनेसे मधुर, बहु अर्थयुक्त होनेसे गंभीर, मनको आनंदित करनेवाली, कर्णकरे सुख देनेवाली, ऐसी कथा कहते है, जिस कथाको सुनकर क्षपकको पूर्वकाल | में अभ्यस्त श्रुतंत्रानके विषयका स्मरण होगा ऐसी कथा वे कहते हैं." णिज्ज्ञायगो इत्येत्सूक्षपद व्या: ENEMA जह पक्खुभिदुम्मीए पाद रणभरिद समुद्दम्मि ॥ णिज्जबओ घारेदि हु'जिंदकरणों बुद्धिसंपण्णो ॥ ५०३ ॥ सुखकारी दधात्येनं मज्जत दुस्तरे भवे ॥ पूतरत्नभृतं पोतं कर्णधार इवार्णधे ॥ ५१९ ।। विजयोदया-जह पपखुभिदुम्मीए यथा प्रचलिततरंगे । समुहम्म समुद्र । पोर्द पोतं नार्य । रदणभरिद रत्नभेरितं णिज्जवगो निर्यापकः । धारे हि खुधारयति । जिनकरणो परिचितक्रियः । मुद्धिसंघण्णोबुद्धिसंपन्नः पुद्धिमान् । .. मूलारा-पखुहिदुम्भीगे क्षुभितोभिके । पोदं प्रवहणं । णिजबगो निर्यापकः कर्णधार इत्यर्थः । जिदकरणो . परिचितक्रियः ॥ णिज्जवगो इस सूत्रपदका स्पष्टीकरण करते हैं__अर्थ--जिसमें तरंग उछल रहे हैं ऐसे समुद्रमें नौका चलानेका जिसने खूब अभ्यास किया है ऐसा | बुद्धिमान नाविक रत्नोंसे भरी हुई नौकायो डूबनेसे रक्षण करता है. तह सजमगुणभरिद परिस्सहुम्मीहिं खुभिदमाइई ॥ णिज्जबओ धारेदि हु महुरेहिं हिदोवदेसेहिं ॥ ५० ॥ शीलसंयमरत्नाढ्यं यतिनावं भवार्णवे ।। निमज्जती महामाज्ञो निभर्ति सूरिनाविकः ॥ ५२० ॥
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy