________________
लाराधना
आश्चासा
६८७
पण करते हैं. अर्थात् रवि आए आलोचमा न करोगे तो आपके रत्नत्रयका नाश होगा और दोषोंफा निवेदन करनेसे आपको रलायकी प्राप्ति होगी आरै उसमें निर्मलतामी प्राप्त होगी इस प्रकार दोष और गुण बतानेवाले आचार्योको आयोपायविदशी आचार्य कहते है. जो क्षपक विशिष्ट अपराधोंको निवेदन न कर सामान्य अपराधोंका निवेदन करता है. और जो अपराध निवेदन करता हआ भी मन में मायामात्र रखता है उसके भी रत्नवयका नाश होता है और निष्कपटभावने अपन सर्व दोपोंकी आलोचना करता है उसको उन्नयनाति और विशद्धि की प्राप्ति होती है.
माया अर्थात कपट दोपोंकी उत्पत्ति करती है और यथार्थ कथन अधीन दीक्षाकालसे आजतक उत्पन्न हुए दोपोंका सत्यकथन गुणोका जनक है इसलिये स्वदोषोंका आचार्य के समीप वर्णन करना चाहिये ऐसा आचार्य आगेकी गाथामें कहते हैंभाषायां दोपयाधात्म्यकथनं च गुण दर्शयति पत्र दोषमकटने कर्तव्यविचाट--
दुखण लहद्द जीवो संसारमहण्णवम्मि सामणे ।। तं संजमं खु अबुहो जासेइ लसलमरणेण || ४६३ ॥ तुम्ग्वतः संयम लब्ध्वा शरीरी भवसागरे ।।
सशस्यमृत्युना सारं नाशयत्यपचंतनः ॥ ४७३ ॥ विजयोदया-दुक्खण लहाजीपो परेशान लभते जीयः । किं सामपणं धामण्यं चारित्रं संयम 1. संसार माध्यम्मि चतुर्गतिपरिभ्रमणमहार्णधे दुष्पापपारतया संसारो महार्णव य । खुशब्दःणासह इत्यतः परतो द्रपक्यः । तं संयम माशयत्येषाधुधः ससलमरण | पचपि शल्यममेकप्रकारे मिथ्यामायानिदानशल्यभेदेन तथापीह प्रकरणय शान्मायाशल्यं गृयते, मायाशल्यसहितेष मरपोमेस्पधः । ननु समाजतायाःप्रस्तुतत्वात् सामण्णं इत्यनेन तत् परित्यज्य कथमम्य दुपयस्तं 'तं संजममिति' । अस्यायमभिप्रायः श्रमणशब्दस्य व्ये प्रवृत्तिनिमिस यच्छामण्यं किं च तत्संयमः । तथापि सावधाफियापरो नार्य श्रमण इति लोको बदति। ततोऽयुक्तमेव भावशल्यभात्मन्यपस्थितामिव दोपमावहतीति दृष्टान्तमुखेन कथयति
न केवलं प्रकारकः सन्सूरिः भपकस्य बायभुपचार तथा करोत्यपि धायापायविदर्शी सन्नाध्यात्मिकमपीत्थं दोषप्रकाशनयेति तामेव प्रबंधनाइ
६८७