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________________ मलाराधना Soआधामः नहीं करता है. मेरा आचरण निर्दोष है यह सिद्ध करना चाहता है इस हेतुसे भी वह दोपोंकी आलोचना करने को तैयार होता नहीं. यदि मैं अपने अपराध इनको कहूंगा तो ये मेरा त्यांग करेंगे ऐसी भी भावना क्षपक मनमें स्थान कर बैठती है. अतः वह यद्यपि अपने अपराध और शरीरका त्याग करनेके लिये उद्युक्त हुआ है तो भी गुरुको अपने दोष कहता नहीं, ६८६ तस्स अवायोपायविदंसी खवयस्स ओघपण्णवओ ॥ आलोधेरास अणुज्जगत्स देसइ गुणदासे ॥ ४६२ ।। आयापायविधिर्येन हेयोपादेयवेदिना विश्यते क्षपकस्पासावायापायदिगुच्यते ॥ ४७४ ।। आयो रस्नत्रयस्य वृद्धिः। अपायो रत्नत्रयविनाशः । ततो वक्रमतेस्तस्य सामान्यालोचनाकृते ॥ आयापापदिशाबाच्यो गुणदोषी गणेशिमा ।। ४७५ ।। विजयोदया-तस्त वषगस्स गुप्पदोस सेविति पदसंबंधः । तस्य अनालोचकस्य थालोधनायां गुणमितरत्र दोपं च दर्शयति । कः ? आयोपायविदंसी आपरेपापषिदर्शी सूरिः । अपायो रत्नत्रयस्यविनाशः उपायो लाभः । उपायशब्दोऽनर्थकः इति कृस्वा रत्नत्रयस्य माउ शुद्धिामः तदुभयदर्शी ओधपण्याबगो सामान्य प्ररूपयन यो न कथयति स्वापराधं तस्यायं दोष इति । भालोचेंतस्स वि अपि शरदोऽन्न लुप्तनिर्दिणे आलोचना कुर्वतोऽपि । अणुरागरस मायावतः ।। मूलारा---अपायो रत्नत्रयस्थ विनाशः । उपायो लामस्तो विशेषण दर्शयति । ओधपण्णवगो सामान्यं प्रहपयन् । यो न कथयति स्वापराधं तस्यायं दोषः इति प्रशापकः । आलोचेंतस्स आलोचना कुर्वतोऽपि । अणुजगस्स मायावसः । गुणदोसे आलोचनायां गुणान् अनालोपनायां च दोषः ।। अर्थ-जो धपक उपर्युक्त कारणोंसे दोषोंकी आलोचना करनेमें भययुक्त होता है. उसको आयोपाय दर्शन गुणके धारक आचार्य आलोचना करने में गुण और आलोचना न करनेसे हानि कैसी होती है इसका निरू ६८६
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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